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Friday, July 2, 2010

'नाम' की राजनीति

कहते हैं कि नाम में क्या रखा है। लेकिन मायावती जी के लिए नाम में बहुत कुछ रखा है। या यूं कहें कि नाम में ही सब कुछ रखा है। इसलिए मायावती नाम की राजनीति कर रही हैं। सच में मायावती जी नाम की राजनीति से ऊपर उठ ही नहीं सकी हैं। उन्होंने अमेठी को जिला बना दिया लेकिन इसका नाम बदलकर क्षत्रपति साहूजी महाराज नगर कर दिया। यह राहुल बाबा की दलितों की राजनीति को माया के अंदाज में काट है।
राहुल गांधी जिस तरह से दलितों के घर में जाते हैं, उनके साथ खाना खाते हैं और जिस तरह से उनकी यू.पी. में लोकप्रियता बढ़ रही है इससे माया का बौखलाना स्वाभाविक है। मायावती ने पहले भी इसी तरह कई जिलों का नाम बदला था। भले ही इससे इन जिलों का भाग्य नहीं बदला हो। लेकिन माया को तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। वह तो अपने ही धुन में रहती हैं।

किसी जगह का नाम उस जगह की पहचान होती है। उसका वहां के इतिहास से जुड़ाव रहता है। नाम बदलने का मतलब है उस पहचान को नष्ट करना। लोग जितना किसी खास नाम से जुड़ाव महसूस करते हैं उतना नए नाम से नहीं कर पाते हैं।
माया जी को अगर पिछड़े लोगों को ऊपर उठाना है और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना है तो उन्हें इसके लिए विकास का एक विस्तृत खाका तैयार करना होगा और उसपर अमल करना होगा। लोगों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मुहैया करवाना होगा. तभी जाकर उनका उत्थान होगा। शहरों के नाम बदलने या पार्क बनाने से लोगों का भला नहीं होने वाला है। जितना पैसा पार्क पर खर्च किया जा रहा है उतना अगर स्कूल बनाने पर खर्च किया जाए तो वहां से एक बेहतर पौध तैयार होगी जो सबल, सक्षम और आत्मनिर्भर होगी और जिसे अपने उत्थान के लिए किसी नेता की आवश्यकता नहीं होगी।