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Tuesday, July 6, 2010

बंद पर बहस

महंगाई को लेकर विपक्ष का भारत बंद सफल रहा। इसपर अब बहस गरमाने लगी है कि भारत बंद करना सही था या नहीं? हिन्दुस्तान ने इसी खबर को अपनी आज की लीड बनाते हुए शीर्षक दिया है क्या मिला। पत्र ने बंद से होने वाले नुक्सान का आंकड़ा दिया है। पत्र ने अपने 'दो टूक' में लिखा है कि बंद सफल रहा। लेकिन यह बंद किसके खिलाफ था? जाहिर है केंद्र सरकार। लेकिन इसका खामियाजा किसको भुगतना पड़ा? आम आदमी को। बड़ी अजीब बात है कि मुद्दा आम आदमी का और निशाने पर भी वही। क्या विरोध का कोई रास्ता नहीं रह गया है? आगे पत्र विरोध का तरीका बताता है कि आपका कोई नेता अनशन पर बैठ जाता। अधिक से अधिक क्या होता? भूख से मर जाता। लेकिन तब ऐसा तूफान उठ खड़ा होता जिससे सरकार को अपनी नीति बदलनी पड़ती।

हिंदुस्तान कांग्रेसी विचारधारा वाला अखबार है, इसलिए उससे सरकार के मुखर विरोध की आशा नहीं कर सकते हैं। लेकिन गंभीर मुद्दे पर इस प्रकार की निर्लज भाषा की भी उम्मीद नहीं कर सकते हैं। किसी भी मामले में किसी भी व्यक्ति को जान देने के लिए कैसे कह सकते हैं? नेता भी तो हमारे ही समाज का हिस्सा हैं। क्या उनकी जान सस्ती है?
यह बात यही है कि बंद से आम जनजीवन प्रभावित होता है। हजारों करोड़ का नुकसान होता है। बंद के दौरान इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि आवश्यक सेवाओं पर कोई बाधा नहीं पड़े। साथ ही बसों, ट्रेनों और सार्वजनिक या किसी की निजी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। बंद स्वेच्छा से हो न कि जबरन। बात-बात पर बंद भी सही नहीं है।
लेकिन जिस तरह से महंगाई बढ़ती जा रही है और सरकार हाथ पर हाथ धरे तमाशा देख रही है। सरकार की ओर से जनता को महज आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला है। सरकार के मंत्री को आम जनता के हितों से ज्यादा क्रिकेट का हित प्यारा है। ऐसी हालात में विरोध का यह स्वरूप जायज था। सरकार अभी तक इसलिए निश्चिंत बैठी है कि विरोध का कोई हल्का सा भी स्वर उसके बहरे कानों तक नहीं पहुंच पा रही है। सरकार को लगता है कि मनमानी करते जाओ विपक्ष तो बंटा हुआ है ऐसे में सरकार को कौन हिला सकता है। ऐसे समय में इस गंभीर मसले पर विपक्ष की एकजुटता का प्रदर्शन जरूरी था और अगर यह नहीं होता तो यही लोग विपक्ष को ही कोस रहे होते कि जनता महंगाई से मर रही है और विपक्ष सोया हुआ है।
यह कहना कि आम आदमी के हितों के लिए आम आदमी को परेशान किया गया सही नहीं है। आखिर इतने बड़े मसले पर कुछ तो त्याग करना ही होगा। दिहाड़ी पर कमाने वाला मजदूर एक दिन थोड़ा कम कमाया यह तो दिखता है लेकिन वही मजदूर जब दिहाड़ी कमा कर घर लौटता है और महंगाई की वजह से उतने रकम में घर की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता है, तब इस पर कोई चर्चा नहीं होती है। आंकड़ों में तो दिखा दिया गया कि इतने हजार करोड़ का नुकसान हो गया। इन आंकड़ों में कितनी हकीकत होती है और इस बात पर क्यों नहीं बहस होती है कि सरकारी लापरवाही से बंदरगाहों या गोदामों में अनाज सड़ते रहते हैं और बाजार में इनकी कमी से वस्तुओं की कीमतें आसमान छूती हैं। इससे होने वाले नुकसान के बारे में क्या कहेंगे?
जहां तक बंद से कुछ मिलने ना मिलने का सवाल है, यह जरूरी नहीं है कि किसी भी चीज का परिणाम एक ही दिन में हासिल हो जाए और न ही किसी काम को यह सोंचकर नहीं रोक सकते हैं कि इसमें हम असफल हो जाएंगे। आज विरोध का एक स्वर उभरा है। कल को हो सकता है पूरी जनता ही सड़क पर आ जाए। ऐसे हालात में सरकार को सोंचने पर मजबूर होना पड़ेगा।