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Sunday, August 22, 2010

सेवा नहीं सिर्फ मेवा की चिंता

पहले अपने देश में दो क्षेत्र ऐसे थे जिसमें सेवा भाव अधिक था। लेकिन बदलते जमाने के साथ इन दोनों क्षेत्रों को भी प्रोफेशनलिज्म और मैनेजमेंट ने अपने जबड़े में लिया है। मैं बात कर रहा हूं शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र की। अब यहां सेवा कम और मेवा पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

पिछले दिनों मुझे इन दोनों सेवाओं में बढ़ते व्यापार से सामना हुआ। पहले शिक्षा को लेते हैं। पिछले दिनों मेरे एक रिश्तेदार अपने बेटे के एडमिशन के लिए दिल्ली आए। मुझे भी उनके साथ स्कूल जाना पड़ा। स्कूल 'तथाकथित' इंटरनेशनल था। स्कूल दिल्ली के बाहरी इलाके में एक गांव में कई एकड़ में फैला था। स्कूल में अस्तबल, खेल के मैदान, स्विमिंग पुल आदि मौजूद थे। स्कूल का फीस तो लाख दो लाख था पर उनके बेटे ने दसवीं में A+ ग्रेड पाया था इसलिए उसे पूरा स्कॉलरशिप मिल गया था। ऐसा स्कूल इसलिए करते हैं कि अच्छे स्टूडेंट को लेने से उनका रिजल्ट अच्छा हो सके।

स्कूल में मैंने देखा कि इंजीनियरिंग और मेडिकल के कोचिंग सेंटर अपना स्टॉल लगा कर बैठे थे। कैंपस में भी कोचिंग की व्यवस्था थी और अगर कोई छात्र कोचिंग के लिए बाहर जाना चाहे तो उसे स्कूल बस से कोचिंग सेंटर लाने और ले जाने की व्यवस्था थी। उस कोचिंग वाले ने हमें समझाया कि आपका लड़का सुबह से दोपहर तक स्कूल में क्लास करेगा उसके बाद दोपहर से शाम तक बाहर कोचिंग करेगा और शाम में थका आएगा तो सेल्फ स्टडी कब कर पाएगा। उसने बताया कि अगर अपने बच्चे को कैंपस में ही कोचिंग में डलवा देते हैं तो स्कूल का क्लास नहीं करना पड़ेगा और ना ही कोचिंग के लिए बाहर जाना पड़ेगा। इस तरह सेल्फ स्टडी के लिए वक्त भी मिल जाएगा। इसके लिए स्कॉलरशिप की भी व्यवस्था थी लेकिन स्कॉलरशिप मिलने के बाद भी कोचिंग की फीस 75 हजार थी। मेरे मन में सवाल उठा कि जब कोचिंग में ही पढ़ाना है तो फिर बच्चे को लोग इतनी दूर क्यों लाते हैं और स्कूल की क्या भूमिका रह जाती है।

बहरहाल उस समय मेरे रिश्तेदार ने कोचिंग में बच्चे को नहीं डलवाया। लेकिन कुछ समय बाद उन्हे महसूस हो गया कि स्कूल में पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं है और बच्चे को कोचिंग में डलवाना ही पड़ेगा। आजकल जगह-जगह कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कोचिंग सेंटर तो लोगों को तो सपने बेच ही रहे हैं। लेकिन क्या स्कूल सपनों को बेचने में सहयोग कर बहती गंगा में हाथ नहीं धो रहे हैं।

पहले जहां गुरूकुल प्रणाली थी। छात्र अगर गरीब होता था तो गुरू की सेवा कर शिक्षा प्राप्त कर सकता था। गुरू का भी जोर छात्रों को अच्छी शिक्षा देने में होती थी। लेकिन आजकल तो व्यवस्था एकदम उलट ही गई है।
अब चिकित्सा सेवा को लेते हैं। पिछले महिने घर के एक सदस्य को कुछ तकलीफ थी। इलाज के लिए निजी अस्पताल गईं। चूंकि उनके पास मेडीक्लेम था इसलिए अस्पताल नें उन्हें भर्ती करने में जरा भी देर नहीं की। पानी का बोतल लगा दिया गया और तरह-तरह के टेस्ट करवाया जाने लगा। कोई बिमारी नहीं होने पर भी तीन दिनों तक अस्पताल में ही रूकने का इंतजाम कर दिया गया।

दूसरा केस मेरे पिताजी का है जो डायबिटिज के मरीज हैं। उन्हें एक सरकारी अस्पताल में ही लेकर गया। उन्हें डॉक्टर ने सात तरह की दवाईयां लिखी हैं जो आजीवन चलेगा और दवाईयों का खर्च दो हजार महिना है। मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि डायबिटिज या ब्लडप्रेशर जैसे रोग जो एक बार होने के बाद मरने तक चलते हैं,के लिए सस्ती दवाईयां नहीं बननी चाहिए। अगर यह रोग गरीब या निम्न मध्यम वर्ग के लोग को हो तो वह इसना खर्चा कैसे उठाएगा। उसे तो रोग को नजरअंदाज करना पड़ेगा। बचपन में अगर पेट में कोई गड़बड़ी होती थी तो दस पैसे के दवा से ठीक हो जाता था लेकिन आजकल को इसके लिए भी दस रूपये का दवा लेना पड़ता है। कंपनियों का तो मुनाफा ही कर्तव्य है लेकिन डॉक्टर सेवा के अपने कर्तव्य को क्यों भूल जाते हैं।