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Friday, March 22, 2013

बाबा होली और मस्ती


होली का नशा हवा में घुलने लगा है. इसका सुरूर लोगों को अपनी आगोश में लेने लगा है. सब अपनी मस्ती में मस्त हैं. क्या करे मौसम ही कुछ ऐसा है. कहीं होली गाई जा रही है तो कहीं जोगीरा. कहीं लट्ठमार होली खेली जा रही है तो कोई अपनी हरकतों से दूसरों पर लट्ठ बजा रहा है. इसी मस्ती भरे माहौल में मैं बाजार घूमने निकल पड़ा. बड़े दिनों से चाट और गोलगप्पे खाने की इच्छा थी. इसे टाल रहा था लेकिन जब चावला जी चाट वाले के सामने से गुजरा तो रहा नहीं गया. दुकान पर बैठे चावला जी परेशान दिखे. मैंने पूछा चावला जी होली नजदीक है. शहर के माहौल में उमंग और तरंग बिखरा है,  इस फाग उदासी का राग कैसा?  चावला जी भडक़ गए और मीडिया को जमकर खरी खोटी सुनाई. मैंने पूछा कि आखिर मीडिया से क्या गलती हो गई. तो उन्होंने कहा कि मीडिया वाले नाहक ही किसी से पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं. जब से टीवी पर बाबा का प्रवचन बंद हुआ है,  चाट समोसे और गोलगप्पे की बिक्री कम हो गई है. पहले बाबा भी खुश थे, भक्त भी खुश और हम भी खुश, लेकिन मीडिया को किसी की खुशी देखी नहीं जाती. जब गोलगप्पे खाकर ही प्रॉब्लम सॉल्व हो जाती थी तो इससे क्या दिक्कत है. प्रॉब्लम सॉल्व करने का इससे सस्ता तरीका क्या हो सकता है?

खैर मैं चाट खाकर चावला जी को सांत्वना दिया और आगे निकल लिया. आगे चौक पर बनारस वाले पांडे जी मिल गए. पांडे जी से पूछा कि बाबा की नगरी वाराणसी का समाचार कहिए. पांडे जी ने कहा का कहें भाई इ फागुन का नशा बाबा लोगों पर भी चढ़ गया है. अभी हाल ही में एक विदेशी बाला शांति की तलाश में बनारस आई. एक बाबा के पास पहुंची. बाबा उसे देखकर हिल गए, उनके मन की शांति भंग हो गई.  उसे देखकर बाबा ब्रह्मचारी का दिल धक-धक करने लगा. बाबा ने आखिर बाला से पूछ ही लिया, विल यू मेरी मी? बाला आखिर शांति की तलाश में आई थी कौनो शादी के खातिर तो आई न थी. उसने साफ कह दिया नो नो सॉरी जी. बाबा भडक़ गइन. बाबा ओकर दो चार जमा दिए. सारी तपस्या को पहले ही भंग हो गई थी अब शांति भी भंग हो गई. पुलिस बाबा तो ढूंढ़ रही है.

बाजार से घूम घाम कर कमरे पर लौटा और समाचार देखने लगा तो पता चला कि एक बाबा सरकार से और सरकार बाबा से परेशान है. सूखे की मार झेल रहे एक राज्य की सरकार ने बाबा को होली न खेलने को कहा था लेकिन बाबा हैं कि मानते नहीं. बाबा ने लाखों लीटर पानी से होली खेली और आगे भी कई शहरों में इसी तरह अपने भक्तों पर पानी की बौछार करने का इरादा है. मीडिया पहुंची तो संत के श्री मुख से असंसदीय भाषा निकलने में देर न लगी. मीडिया वालों को बाबा और उनके भक्तों ने लात-घूसों का प्रसाद बांटा. बाबा का कहना है कि होली तो भदवान का अमोल उपहार है. पानी जाया नहीं जाता, इससे मानसिक विषाद दूर होता है.  बाबा को समझ में नहीं आ रहा है कि सरकार को कैसे समझाए कि होली में रंग न खेलेंगे तो क्या गुल्ली डंडा खेलेंगें.

खैर इस होली में सबसे ज्यादा मस्ती ज्योतिष लोगों की है. हर जगह अपना स्कोप ढूंढ़ ही लेते हैं. कल ही कहीं पढ़ रहा था कि आपकी राशि को कौन सा रंग सूट करेगा. अब ज्यतिषी जी को कौन समझाए कि लोगों की राशि पूछ कर रंग लगाएं या अपनी राशि के मुताबिक लोगों को कहें कि मुझे यही रंग लगाओ दूसरा रंग नहीं लगा सकते. फिर मकर और कुंभ राशि वालों का क्या होगा, जिसके लिए ज्योतिष सूटेबल रंग नीला और काला बता रहे थे. क्या वो नील और कालिख पुतवाता और लोगों को पोतता रहे. खैर भइया ज्यादा कुछ बोल गया तो मांफ करना और बुरा तो हरगिज मत मानना क्योंकि भइया इ होली का मौसम है और होली में बुरा नहीं माना जाता.

फोटो गूगल से साभार