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Monday, March 17, 2014

होली, ब्लू पानी और बेबी डॉल

आज होली है, लेकिन होली है... या बुरा न मानों होली है का शोर अब तक सुनने को नहीं मिला है. होली को लेकर कोई उमंग नहीं है. कोई फीलिंग नहीं है. न तो पारंपरिक होली गीत सुनने को मिल रहे हैं न ही फिल्मी होली गीत ही. पहले जहां महीने पहले से हवाओं में होली के गीत घुलने लगते थे अब तो होली के दिन भी कम ही सुनने में मिलता है. इनकी जगह अब बेबी डॉल ब्लू आईज और आज ब्लू है पानी ने ले लिया है. ऐसा नहीं है कि गांव से दूर होने के कारण ऐसा लग रहा है. पिछले साल तक होली पर गांव की बहुत याद आती थी, लेकिन वर्षों बाद जब पिछले साल गांव में होली के पर्व में शरीक होने का मौका मिला तो सब कुछ बदला-बदला सा था. अब वहां भी पहले की तरह होली नहीं गाया जाता. अब होली गाने वाले भी नहीं रहे. न तो पहले की तरह रंग और अबीर खेला जाता है. सब लोग अपने में ही सिमट से गए हैं. दिल्ली और एनसीआर में तो रंग से ज्यादा पानी डालते हैं और दोपहर तक होली समाप्त, लेकिन हमें तो बचपन से आदत रही है रंग के बाद शाम में अबीर खेलने की. बड़ों के पैर पर अबीर रख कर आशीर्वाद लेने की और बच्चों को अबीर का टीका और हमउम्रों के गाल में अबीर मलने की.

हां होली के कुछ दिनों पहले से स्टूडेंट्स जरूर दिख जाते हैं रंगे हुए. तो क्या हम नौकरीपेशा हो गए या हमारी उम्र बीत गई इसलिए ऐसा लग रहा है ? मैंने अपने भतीजे-भतीजियों से भी फीडबैक लिया. पता चला वो लोग भी होली की मस्ती से वंचित है. आखिर कुछ तो है.  आखिर इतना कैसा बदल गया त्योहार. ये सिर्फ होली की ही बात नहीं है. दशहरा, दीवाली आदि सभी पर्वों पर पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया. पहले सुनने में आता था कि पर्व तो पैसे वाले के लिए है, लेकिन अब लगता है कि लोग आर्थिक रूप से जितने संपन्न होते जा रहे हैं, सांस्कृतिक रूप से उतने ही विपन्न होते जा रहे हैं. मुझे याद नहीं है कि आज से दस साल पहले हम लोग हैप्पी होली कह कर किसी को शुभकामनाएं देते थे. बस रंग लगाया और जोर से चिल्लाते हुए होली है.... कितनी खुशी मिलती थी. यकीन मानिए हैप्पी होली के आप लोगों को जितने भी मैसेज दे दीजिए वो फीलिंग नहीं आ पाती है. वो खुशी नहीं मिलती है. क्या होली सिर्फ एक दिन की छुट्टी भर रह गया है या नशा करने वालों को नशे में डूबने का दिन. खैर छोड़िए इन बातों को कुछ होली के गीतों का मजा लेते हैं. गांव में किसी मंदिर में जाकर होली गाया जाता है तो पहले देव को समर्पित एक गीत होता है. जैसे मंदिर के खोलो केवाड़ या तुम निकट भवन पर बैठ भवानी. ऐसा ही एक गीत ये भी है..

आए-आए देव के द्वार दर्शन करने को -2
हम सब दर्शन करने को
हम सब दर्शन करने को

कोई नहीं पाए पार दर्शन करने को

आए-आए देव के द्वार दर्शन करने को.

सुर नर मुनि सब चकित भए हो

सुर नर मुनि सब चकित भए


कोई नहीं पाए पार दर्शन करने को


 
आए-आए देव के द्वार दर्शन करने को

 
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता

महिमा अगम अपार दर्शन करने को

आए-आए देव के द्वार दर्शन करने को.

इसके बाद रामायण या महाभारत के प्रसंग या श्रृंगार रस के कई गीत गाए जाते हैं और सब से अंत में सदा आनंद रहे यह द्वारे मोहन खेले होली हो. सुनने का मजा ही कुछ और है.

Friday, March 22, 2013

बाबा होली और मस्ती


होली का नशा हवा में घुलने लगा है. इसका सुरूर लोगों को अपनी आगोश में लेने लगा है. सब अपनी मस्ती में मस्त हैं. क्या करे मौसम ही कुछ ऐसा है. कहीं होली गाई जा रही है तो कहीं जोगीरा. कहीं लट्ठमार होली खेली जा रही है तो कोई अपनी हरकतों से दूसरों पर लट्ठ बजा रहा है. इसी मस्ती भरे माहौल में मैं बाजार घूमने निकल पड़ा. बड़े दिनों से चाट और गोलगप्पे खाने की इच्छा थी. इसे टाल रहा था लेकिन जब चावला जी चाट वाले के सामने से गुजरा तो रहा नहीं गया. दुकान पर बैठे चावला जी परेशान दिखे. मैंने पूछा चावला जी होली नजदीक है. शहर के माहौल में उमंग और तरंग बिखरा है,  इस फाग उदासी का राग कैसा?  चावला जी भडक़ गए और मीडिया को जमकर खरी खोटी सुनाई. मैंने पूछा कि आखिर मीडिया से क्या गलती हो गई. तो उन्होंने कहा कि मीडिया वाले नाहक ही किसी से पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं. जब से टीवी पर बाबा का प्रवचन बंद हुआ है,  चाट समोसे और गोलगप्पे की बिक्री कम हो गई है. पहले बाबा भी खुश थे, भक्त भी खुश और हम भी खुश, लेकिन मीडिया को किसी की खुशी देखी नहीं जाती. जब गोलगप्पे खाकर ही प्रॉब्लम सॉल्व हो जाती थी तो इससे क्या दिक्कत है. प्रॉब्लम सॉल्व करने का इससे सस्ता तरीका क्या हो सकता है?

खैर मैं चाट खाकर चावला जी को सांत्वना दिया और आगे निकल लिया. आगे चौक पर बनारस वाले पांडे जी मिल गए. पांडे जी से पूछा कि बाबा की नगरी वाराणसी का समाचार कहिए. पांडे जी ने कहा का कहें भाई इ फागुन का नशा बाबा लोगों पर भी चढ़ गया है. अभी हाल ही में एक विदेशी बाला शांति की तलाश में बनारस आई. एक बाबा के पास पहुंची. बाबा उसे देखकर हिल गए, उनके मन की शांति भंग हो गई.  उसे देखकर बाबा ब्रह्मचारी का दिल धक-धक करने लगा. बाबा ने आखिर बाला से पूछ ही लिया, विल यू मेरी मी? बाला आखिर शांति की तलाश में आई थी कौनो शादी के खातिर तो आई न थी. उसने साफ कह दिया नो नो सॉरी जी. बाबा भडक़ गइन. बाबा ओकर दो चार जमा दिए. सारी तपस्या को पहले ही भंग हो गई थी अब शांति भी भंग हो गई. पुलिस बाबा तो ढूंढ़ रही है.

बाजार से घूम घाम कर कमरे पर लौटा और समाचार देखने लगा तो पता चला कि एक बाबा सरकार से और सरकार बाबा से परेशान है. सूखे की मार झेल रहे एक राज्य की सरकार ने बाबा को होली न खेलने को कहा था लेकिन बाबा हैं कि मानते नहीं. बाबा ने लाखों लीटर पानी से होली खेली और आगे भी कई शहरों में इसी तरह अपने भक्तों पर पानी की बौछार करने का इरादा है. मीडिया पहुंची तो संत के श्री मुख से असंसदीय भाषा निकलने में देर न लगी. मीडिया वालों को बाबा और उनके भक्तों ने लात-घूसों का प्रसाद बांटा. बाबा का कहना है कि होली तो भदवान का अमोल उपहार है. पानी जाया नहीं जाता, इससे मानसिक विषाद दूर होता है.  बाबा को समझ में नहीं आ रहा है कि सरकार को कैसे समझाए कि होली में रंग न खेलेंगे तो क्या गुल्ली डंडा खेलेंगें.

खैर इस होली में सबसे ज्यादा मस्ती ज्योतिष लोगों की है. हर जगह अपना स्कोप ढूंढ़ ही लेते हैं. कल ही कहीं पढ़ रहा था कि आपकी राशि को कौन सा रंग सूट करेगा. अब ज्यतिषी जी को कौन समझाए कि लोगों की राशि पूछ कर रंग लगाएं या अपनी राशि के मुताबिक लोगों को कहें कि मुझे यही रंग लगाओ दूसरा रंग नहीं लगा सकते. फिर मकर और कुंभ राशि वालों का क्या होगा, जिसके लिए ज्योतिष सूटेबल रंग नीला और काला बता रहे थे. क्या वो नील और कालिख पुतवाता और लोगों को पोतता रहे. खैर भइया ज्यादा कुछ बोल गया तो मांफ करना और बुरा तो हरगिज मत मानना क्योंकि भइया इ होली का मौसम है और होली में बुरा नहीं माना जाता.

फोटो गूगल से साभार