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Monday, May 2, 2016

गौर से सुनिए इस आहट को

12 अप्रैल सुबह खबर आई कि मेरठ के मिलिट्री अस्पताल में तेंदुआ घुस आया है। लगातार तीन दिनों तक तेंदुआ लोगों को छकाता रहा। तेंदुए ने विभागों की पोल खोल दी। तेंदुए के पकड़े जाने के बाद लोगों ने राहत की सांस ली। इस घटना के हर दूसरे या तीसरे दिन कहीं न कहीं से तेंदुआ देखे जाने की खबरें आती रहती हैं। हालांकि नेशनल मीडिया इन खबरों को ज्यादा तवज्जो नहीं देता। ये पिछले दो वर्षों में मेरठ में तेंदुआ आने की दूसरी घटना थी। इससे पहले फरवरी 2014 में भी मेरठ कैट तेंदुआ घुस आया था। मेरठ के लोग खुशकिस्मत थे कि तेंदुए ने लोगों की जान को नुकसान नहीं पहुंचाया, लेकिन कल्पना कीजिए तेंदुआ की जगह बाघ या शेर झुंड में घुस आए तो क्या होगा।

महाराष्ट्र भयंकर सूखे की चपेट में है। हालात इतने बिगड़े हैं कि लोग पानी के लिए अपनी जान भी गंवा रहे हैं। कुएं में जान जोखिम में डालकर पानी भरते महिलाओं और।बच्चों की तस्वीरें झकझोर देती हैं। ये सिर्फ महाराष्ट्र की ही बात नहीं है, देश के कई हिस्सों की यही कहानी है। भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। मेरे गांव में घर के अंदर का कुआं जिसे पंप के जरिए नहीं सुखाया जा सकता था, अब बरसात में भी सूखा रहता है।

महाराष्ट्र में सूखे को लेकर सरकार ने आईपीएल मैच में पानी देने से इनकार कर दिया। मामला कोर्ट तक गया। आखिरकार आईपीएल मैच महाराष्ट्र से बाहर कर दिया गया। माना आईपीएल से करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, लेकिन क्या इसके लिए अमूल्य संसाधनों को बर्बाद किया जा सकता है? सिर्फ पानी ही क्यों डे-नाइट मैच में बिजली की भी बर्बादी होती है।

सुना है एक उद्योगपति विदेश गए थे, वहां उन्होंने जरुरत से ज्यादा खाने का ऑर्डर कर दिया, वो उतना खाना खा नहीं पाए। जब उन्हें एक बुजुर्ग महिला ने टोका तो उन्होंने कहा कि मैंने इसकी कीमत चुकाई है। महिला ने पुलिस को फोन किया और उन्हें जुर्माना देने पड़ा। ठीक उसी तरह अगर कोई पानी या बिजली की ऊंची कीमत अदा करने की क्षमता रखता है तो क्या उसे इसकी बर्बादी करने का हक मिल जाता है?  देश के कई इलाकों में जब लोगों को पीने का पानी नहीं मिल पाता और लोग अंधेरे में जीने को मजबूर हैं तो ऐसी बर्बादी अपराध के समान है।

नेताओं के साथ लोगों की संवेदनशीलता देखिए। सूखे का सर्वे करने गए एक मंत्री के लिए हैलिपैड बनाने के लिए हजारों लीटर पानी बर्बाद कर दिया जाता है। कोई सूखे की सेल्फी ले रहा है। मेरठ में पिछले दिनों हजारों लीटर गंगाजल नाले में बहा दिया या, वजह सिर्फ क्रेडिट लेने की होड़। वहीं जनता भी निश्चिंत है। वो आज में जीती है, हमें इससे क्या लेना हमारे पास तो पानी है, कल की सोचेंगे कल को। मेरठ से दिल्ली आते समय कई जगहों पर लोग हाथों में पाइप लिए सड़क पर पानी छिड़कते मिल गए।

सूखे की चर्चा के बीच अब फसलों के पैटर्न पर चर्चा होने लगी है। किसी का कहना है कि महाराष्ट्र में गन्ने का फसल उगाना बंद कर देना चाहिए तो कोई कहता है कि धान के फसल को बहुत अधिक पानी की जरुरत होती है। इसे भारत में बंद कर देना चाहिए। मैं कोई एक्सपर्ट नहीं हूं, लेकिन मेरा मानना है कि प्रकृति ने हर क्षेत्र मौसम के मुताबिक पेड़-पौधे दिए हैं। उससे छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। अगर किसी क्षेत्र के लिए कोई फसल उपयुक्त नहीं है तो उसे वहां नहीं उगाना चाहिए, लेकिन अगर उपयुक्त है तो उसे बंद भी नहीं करना चाहिए। जैसे यूकेलिप्टस का पेड़ सभी जगह लगाए जा रहे हैं. दलदली इलाके के इस पौधे को प्रकृति का आतंकवादी कहा जाता है, क्योंकि यह पानी को तेजी से सोख लेता है, खुद तो तेजी से बढ़ता है, लेकिन आस-पास की जमीन को बंजर बना देता है, लेकिन इसके बाद भी फलदार वृक्षों पर यहां इसे तरजीह दी जा रही है। उत्तराखंड के जंगलों में आग लगी है। वजह वही संवेदनहीनता। फरवरी में आग लगी, लेकिन जिम्मेदार लोग सोते रहे। आग का कारण चीड़ के पेड़, जिन्हें कभी अंग्रेजों ने लगाया था। ये पेड़ भी प्रकृति के आतंकवादी हैं। ये जैव विविधता के लिए खतरा हैं, फिर भी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। 

चाहे सूखे की समस्या हो या तेंदुए का शहर में घुसना, या उत्तराखंड के जंगलों की आग इन्हें एक-साथ देखने की जरुरत है। ये प्रकृति से खिलवाड़ और हमारी संवेदनहीनता के नतीजे हैं। यह एक आहट है। इस आहट को गौर से सुनिए। कहीं देर न हो जाए। आज भले ही हम सुरक्षित हैं, लेकिन याद रखिए इतिहास सब का लिखा जाता है। आज कोई और भुगत रहा है। कल हमारी बारी हो सकती है।

Sunday, August 29, 2010

पानी, पानी रे पानी, पानी

पिछले दिनों जब दिल्ली बरसात में पानी-पानी हो रही ठीक उसी समय बिहार में लोग पानी-पानी चिल्ला रहे थे। दो साल पहले की ओर लौटें तो इसी समय बिहार बाढ़ से बेहाल था। पिछले साल भी मानसून दगा दे गया था। पिछले कुछ सालों में अगर देखें तो मानसून का रूठना जारी है, कभी तो बहुत ही ज्यादा बारिश और कभी कुछ भी नहीं। जिस इलाके में सूखा रहता था वहां बाढ़ आ जाती है और जहां बाढ़ की समस्या रहती थी वहां सूखा पड़ने लगा है।
कुछ साल पहले मुंबई में इतनी बारिश हुई कि चेरापूंजी का रिकार्ड टूट गया। कुछ साल पहले राजस्थान को भी बाढ़ की तबाही से दो-चार होना पड़ा था। दिल्ली में वर्षों बाद इतनी बारिश हुई है। वहीं बिहार में सूखा पड़ा है। अगर गौर करें तो लगता है कि मानसून का दिशा ही बदल गई है। अब इसका कारण अल निनो हो या ला निनो या फिर ग्लोबल वार्मिंग समय रहते अगर इस समस्या का हल नहीं ढूंढ़ा गया तो पानी के लिए लोग खून बहाएंगे।
दिल्ली जैसे शहरों में भले ही कितनी भी बारिश हुई हो लेकिन इससे भूजल का स्तर नहीं बढ़ा है। गाजियाबाद में एक तरफ लोग आसमान से बरसने वाली पानी से परेशान थे तो दूसरी ओर पीने के पानी के लिए भी तरस रहे थे। बाढ़ और सूखा जैसे आपदा प्रकृति के साथ-साथ मानव निर्मित भी होते जा रहे हैं। अत्यधिक शहरीकरण के कारण पुरानी जल प्रणालियां जैसे झील, तालाब आदि नष्ट होती जा रही हैं। मुंबई के जलमग्न होने की एक वजह मीठी नदी के जल मार्ग के साथ छेड़-छाड़ थी। नदियों या नहरों में गाद जमा होती रहती है लेकिन उसकी सफाई नहीं हो पाती है। आखिर ऐसे में बारिश का पानी कहां जाए। वह तो तबाही मचाएगी ही। पोखरों या झीलों को पाटकर हमने उस पर ऊंचे-ऊंचे महल-दोमहले खड़ा कर दिए हैं। इससे बरसात के पानी का सही सदुपयोग नहीं हो पाता है।
अब वक्त आ गया है कि हम पानी का प्रबंधन करना सीखें। बाढ़ से बचने के लिए पहले तो नदी-नाले और नहरों की सफाई तो करवाई ही जाए दूसरी ओर बरसात के पानी के सदुपयोग के लिए पोखरों और झीलों की भी समय-समय पर सफाई हो साथ ही रेन वाटर हारवेस्टिंग और भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए वाटर रिफिलिंग जैसे उपाय करने होंगे। इसके लिए बहुत अधिक तामझाम करने की भी जरूरत नहीं है बस छतो से नीचे गिरने वाले पानी को पाइप के जरिए कुओं, हैंडपंपों या सॉकपीट के जरिए जमीन के अंदर पहुंचाना है। मुसीबत के समय सरकार की ओर मदद की आस लगाने के बजाय अगर हम खुद ये सब उपाय अपनाएं तो पीने के पानी की समस्या नहीं होगी। सरकार को भी चाहिए कि वह कुछ ठोस पहल करे। नदियों को जोड़ने की जो परियोजना चल रही है उसे समय से पूरा करे साथ ही ऐसे उपाय किए जाएं कि बाढ़ वाले इसाके के पानी का इस्तेमाल सूखा ग्रस्त इलाकों में किया जा सके। आपदा के समय करोड़ों के राहत पैकेज देने से अच्छा है कि आपदा आए ही नहीं इसके लिए समय रहते उपाए किए जाएं।