Wednesday, August 15, 2012

बड़ी समस्याओं के बीच छोटे मुद्दों की तलाश


देश को आजाद हुए 65 साल हो चुके हैं. इन 65 सालों में देश में काफी तरक्की हुई है, लेकिन देश में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी जैसी बड़ी समस्याएं भी हैं, जिनसे देश जूझ रहा है. इन मुद्दों पर बड़ी चर्चा होती है, शोर मचता है और आंदोलन भी होता है, लेकिन इन्ही बड़े मुद्दों के बीच कई छोटे-छोटे मुद्दे हैं जो दब जाते हैं. इन पर इतना शोर नहीं मचता न ही हमारा ध्यान जाता है. आजादी के इन सालों में हम बड़ी चीज पाने के लिए कई छोटी चीज खोते जा रहे है. इनमें कुछ ऐसे हैं जो हमारे परिवार समाज और हमारी यादों से जुड़े हैं. इन्हें ही तलाशने का यह एक प्रयास है.
उधार की जिंदगी
बेहतर जिंदगी की चाह में हम न जाने कितने ही तरह के कर्ज से घिरते जा रहे हैं. युवावस्था में करियर बनाने की चाह में एजुकेशन लोन, फिर नौकरी लगी तो तमाम तरह की सुख सविधा जुटाने की चाह में कार लोन, होम लोन और न जाने कौन-कौन से लोन.  अगर लोन ले लिया तो इस बात का भी डर रहता है कि अगर नौकरी छूट गई तो क्या होगा? लोन देते समय तो कंपनियां मीठी बातें करती हैं लेकिन अगर लोन की किश्त न दे पाए तो इनका सुर बदल जाता है. कर्ज न चुका पाने के कारण कई लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं. इस तरह जिंदगी कर्ज के बोझ तले दबती चली जाती है.

छिनता बचपन
बच्चों से उनका बचपन छिनता जा रहा है. पेरेंट्स के अपेक्षाओं और भारी बस्ते के बोझ तले बच्चे कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता. एक तरफ तो ऐसे बच्चे हैं जिन्हें बाल मजदूरी की आग में झोंक दिया जाता है तो दूसरी तरफ ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें खेलने के लिए संगी-साथी नहीं मिलता. बढ़ते एकल परिवार का चलन और समाज से लोगों का कटना भी इसकी वजह है. बच्चों में अकेलापन बढ़ता जा रहा है.

परिवार और समाज का टूटना
 संयुक्त परिवार की प्रथा समाप्त होती जा रही है. एकल परिवार का चलन बढ़ता जा रहा है. लोग अपने परिवार तक ही सिमट कर रह गए हैं, अपने पड़ोसियों के बारे में उन्हें पता नहीं रहता. पहले मैं अपने गांव में देखता था कि कोई न कोई नाते रिश्तेदार का आना-जाना लगा ही रहता था लेकिन अब किसी फंक्शन में भी कम लोग ही आ पाते हैं.

सम्मान भूलते जा रहे हैं
आज के जेनरेशन में बड़ों के प्रति सम्मान खत्म होता जा रहा है. लोग अपने बुजुर्गों से बेअदबी से बात करते हैं. उनके कुछ कहे का दो टूक जवाब दे दिया जाता है, जबकि पहले जवाब देना तो दूर बड़ों से आंख मिलाना भी मुश्किल था. बड़ों के प्रति अशिष्ट भाषा का प्रयोग भी बढ़ रहा हैय

कहानियां भूल गए
न्यूक्लियर फैमिली के चलन के बीच दादा-दादी की कहानियां कहीं खो गईं. बिजी लाइफ में बच्चों को कहानियां सुनाने वाला कोई नहीं है. पुराने कहानी के पात्रों की जगह पहले चाचा चौधरी, नागराज, ध्रुव, डोगा जैसे कहानी के पात्रों ने लिया और अब उनकी जगह कार्टून के कई कैरेक्टर आ गए हैं. ऐसे में ये कहानियां कहीं विलुप्त न हो जाए.

पारंपरिक खेल भूल गए
वीडियो गेम के प्रति बच्चों में गजब का रुझान है. पुराने खेलों जहां बच्चों में में फिटनेस बनाती थी और उनमें लीडरशिप जैसे गुण विकसित होते थे, जबकि विडियो गेम से बच्चों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है. इन खेलों के न खेलने का कारण यह भी है कि बच्चों को खेलने के लिए साथी नहीं मिलता. लुका-छिपी, पिट्टो/बिट्टो, विष-अमृत जैसे कई खेल हमलोग बचपन में खेला करते थे जो आज के बच्चे नहीं खेलते. इन खेलों का कोई रुल बुक नहीं होता. इन्हे बच्चे एक-दूसरे से ही सीखते हैं. ऐसे में ये ट्रिडशनल गेम कहीं भूला न दिए जाएं.

पलायन आखिर कब तक
पलायन के चलते जहां शहर पर बोझ बढ़ता जा रहा है, वहीं गांव खाली होते जा रहे हैं. बेहतर शिक्षा और भविष्य संवारने की चाह में लोग बड़ी संख्या में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. बचपन में हम जिन दोस्तों के साथ खेलकर बड़े हुए, गांव जाने पर वो नहीं मिलते. गांव बड़ा सूना लगता है.

गायब हो गई चिड़ियों की चहक
बचपन में जिन चिड़ियों को देखते और उनकी चहचहाहट को सुनकर बड़े हुए वो चिड़ियां अब दिखाई नहीं देती. मोबाइल टावरों के रेडिएशन, बढ़ते कंक्रीट के जंगल खाने में कीटनाशकों के इस्तेमाल के कारण चिड़ियों की संख्या घटती जा रही है. जब चिड़ियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाती हैं तो सरकार को उनकी याद आती है. जैसा कि दिल्ली में गोरैय्या को राजकीय पक्षी घोषित किया गया है.

नीला आसमां खो गया
यह समस्या मेट्रो सिटीज की है. यहां बढ़ते प्रदूषण के कारण आसमान का रंग नीला नहीं बल्कि पीला दिखाई देता है.  बचपन के दिनों में गर्मी की रातों में तारों को निहारा करते थे, उनके कई नाम होते थे, उनकी कहानियां होती थीं लेकिन सब खो गया.

  

Tuesday, August 2, 2011

पहले खेल भावना या पहले जीत

भारत-इंग्लैंड टेस्ट सीरिज के दूसरे मैंच में बेल प्रकरण ने एक नया विवाद को जन्म दे दिया है। चर्चा का विषय है कि खेल भावना जरूरी है या खेल में जीत जरूरी है। कल रात स्टार न्यूज एक प्रोग्राम चला रहा था जिसमें बताया जा रहा था कि ऐसी दरियादिली किस काम की है। टीवी पर गेस्ट विनोद कांबली धोनी को कोसने के साथ सवाल उठा रहे थे कि क्या अगर इसी तरह की घटना विश्व कप के फाइनल में होता तो क्या भारतीय कप्तान ऐसी दरियादिली दिखाते?

शो के दौरान पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली पर भी सवाल खड़े किए। सौरव ने भारतीय टीम के फैसले का समर्थन किया था। सौरव के बारे में कहा गया कि एक बार उन्होंने स्टीव वॉ को टॉस के लिए इंतजार करवाया था। सौरव जब लॉर्डस में भारत के जीत के बाद अपनी टी शर्ट घुमा रहे थे तब उनकी खेल भावना कहां गई थी। सौरव अभी ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि वो अब खेल नही रहे हैं। कांबली का कहना था कि एक बार जब अम्पायर ने ऑउट दे दिया तो दे दिया इसके बाद किसी को वापस बुलाने का सवाल ही नहीं उठता।

किसी भी मुद्दे की तरह इसपर भी लोगों के राय अलग-अलग हो सकते हैं। आखिर टेस्ट क्रिकेट में नं. वन रहने के बाद टीम इंडिया की लगातार दो मैंचों में शर्मनाक हार हुई है। ऐसी हार को पचाना मुश्किल हो रहा है। लोगों को लग सकता है कि भारत को भी अपनी बादशाहत बचाने के लिए साम,दाम,दंड और भेद की नीति अपनानी चाहिए। आखिर जंग में तो सब कुछ जायज होता है। ऑस्ट्रेलिया भी जीत के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। क्या भारत की जगह इंग्लैंड होता तो क्या इस तरह का फैसला लेता? इंग्लिस मीडिया ने भी भारत के फैसले को बेतुका बताया है। इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन भारतीय टीम के फैसले की सराहना तो करते हैं लेकिन यह भी कहते हैं कि वो रहते तो शायद ही ऐसा करते।

लेकिन खेल और जंग में अंतर होता है। खेल सिर्फ मनोरंजन के लिए ही नहीं खेला जाता। आजकल को क्रिकेट कूटनीति का भी जरिया है। क्रिकेट को जेंटलमैन गेम कहा जाता है। क्रिकेट दो देशों के रिश्तों में सुधार में भी अहम भूमिका निभाता है। याद कीजिए जब अटल जी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारतीय टीम पाकिस्तान जा रही थी। अटल जी ने टीम इंडिया से कहा था खेल भी जीतिए और दिल भी। उस समय भारत-पाक रिश्तों में जमी बर्फ पिघलनी शुरू हो गई थी। क्या कोई कल्पना कर सकता था कि भारत-पाक मैच पाकिस्तान में हो और कोई पाकिस्तानी तिरंगा लहराए।

किसी भी बात को हम सही या गलत ‘यूं होता तो कैसा होता’ के आधार पर नहीं ठहरा सकते। किसी भी फैसले का फायदा या खामियाजा तो कभी न कभी उठाना ही पड़ता है लेकिन फैसला तो आप इसे देखकर नहीं करते। उस परिस्थिति में जो सही होता है उस आधार पर एक स्टैंड लेना पड़ता है और उस स्टैंड पर कायम भी रहना चाहिए। अब यूडिआरएस सिस्टम को ही लें। वर्ल्ड कप में जब एलबीडब्ल्यू इसके तहत था तो इसका भारत को नुकसान ही हुआ लेकिन इंग्लैंड टेस्ट में एलबीडब्ल्यू इसमें शामिल नहीं था और इसका भी नुकसान भारत को हुआ। ये तो चलता ही रहता है।

वास्तव में देखा जाए तो कोई टीम सही मायने में तभी विजेता मानी जाएगी जब वह मैच के साथ-साथ दिल भी जीते। इसलिए भारतीय टीम का बेल को वापस बुलाने का फैसला सही था। रही बात स्टार न्यूज के हाय-तौबा मचाने की तो उन्हें उस समय को याद करना चाहिए जब ऑस्ट्रेलिया ने गलत तरीके से भारत को हराया था, तब अंपायर ने पोंटिग से पूछ कर भारतीय खिलाड़ी को ऑउट दिया था। तब स्टॉर वालों ने पोंटिग को न जाने क्या-क्या भरा बुरा कहा था। अगर जीत में सब कुछ जायज है और अंपायर ने अगर ऑउट कह दिया तो ऑउट तो उस समय पोंटिग भी सही थे। स्टॉर के लिए भावना कोई मायने नहीं रखती और रखें भी कैसे जब न्यूज चैनल हो कर न्यूज वैल्यू का खयाल ही नहीं करते तो दूसरी चीजों में कैसे उम्मीद की जा सकती है।

Saturday, March 19, 2011

होली- कुछ यादें कुछ गीत

आठ साल हो गए गांव की होली में शरीक हुए... अब तो सिर्फ कुछ यादें ही बची हैं... बचपन में होली का हुड़दंग और बच्चों की टोली के साथ होली खेलने निकलना... लोगों पर रंग डालना और होली है का जयघोष.. ऐसे लोग खास निशाना बनते थे जो रंग से दूर भागते थे।

घर में तरह-तरह के पकवान जैसे पुए,कचौड़ी,आलूदम,दहीबड़े और न जाने क्या-क्या... होली में घर से दूर रहते हुए आखिर धीरे-धीरे कुछ पकवान बनाना सीख ही गया लेकिन इसमें मां के हाथों का जादू और गांव की सोंधी खुशबू नहीं ला पाया...

हमारे गांव में होली के एक दिन पहले लोग धूल और मिट्टी खेलते हैं इसे धुड़खेल कहा जाता है, होली के रोज दिन में रंग खेलते हैं और शाम में नहा धोकर लोग अबीर खेलने निकलते हैं... बड़ों के पैर पर अबीर रखकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है और छोटों,मित्र और हमउम्रों के गाल में अबीर लगाया जाता है....

एक बात और अखड़ती है वह है जोगीरा और होली गीत... जोगीरा में तो गांव के लोगों के बारे में और समकालीन घटनाओं को ही गीतों में पिरो दिया जाता था... शुरू और अंत में जोगीरा सर रर, सर रर रे बराबर सर रर... महीने भर पहले से ही होली गाना शुरू हो जाता है... गीत शुरू में धीमा होता है और धीमें-धीमें आगे बढ़ता है और अंत तक यह काफी जोशीला हो जाता है... इसे देखना और सुनना काफी अच्छा लगता है... अगर आप नहीं भी गा रहे होते हैं तब भी बदन बरबस थिरक उठता है...

होली गीत कई तरह के होते हैं.... इसमें भक्ति, रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला, श्रृगांर प्रधान गीत होते हैँ... सबसे पहले भक्ति गीत से शुरुआत की जाती है... कुछ गीत प्रश्नोत्तर शैली में होते हैं.. ऐसा ही एक होली गीत है जो किसी देवस्थान में जाकर सबसे पहले गाया जाता है...


मंदिर के खोलो किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
मंदिर के खोलो किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
ठाढ़े दुनिया दर्शन को हो ठाढ़े दुनिया दर्शन को
मंदिर के खोलो किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
काथि के मंदिरा बने हो काहे के मंदिरा बने
कथि लगे केवाड़, माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
मंदिर के खोलो किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
पत्थर के मंदिरा बने हो पत्थर के मंदिरा बने
चंदन लगे केवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
मंदिर के खोलो किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
कहे ल मंदिरा बने हो कहे ल मंदिरा बने
काहे लगे किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
मंदिर के खोलो किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
पूजा ल मंदिरा बने हो पूजा ल मंदिरा बने
फाटक लगे किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को
मंदिर के खोलो किवाड़ माता ठाढ़े दुनिया दर्शन को

एक गीत कृष्ण लीला से...


कहां अटके, कहां अटके बनवारी सखी हो कहां अटके
कहां अटके, कहां अटके बनवारी सखी हो कहां अटके
खोजत फिरत मां तू जशोदा, घर-घर करत पूछारी
कारण कौन नाथ नहीं आए कंषन के डर भारी
कहां अटके, कहां अटके बनवारी सखी हो कहां अटके
झुंड के झुंड सखि सब आए, पढ़त जशोदा के गारी
मोर मटुकिया फोड़ दियो है, फाड़ दियो तन साड़ी
कहां अटके, कहां अटके बनवारी सखी हो कहां अटके
बिलखल-बिलखल मोहन आए, नैना नीर बहाए
मोर मुरलिया छीन लियो है सखियन सब मिल सारी
कहां अटके, कहां अटके बनवारी सखी हो कहां अटके
आचल ओट हंसे सखियन सब, देखो प्रभु की चतुराई
सूरदास प्रभु तुमरे दरस को तुम्हीं जीते हम हारी
कहां अटके, कहां अटके बनवारी सखी हो कहां अटके
अंत में सबों को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं... दुनिया से भय,भूख और भ्रष्टाचार की होलिका जले और लोगों का जीवन नए-नए रंगों से रंगीन हो... होली मुबारक।

Saturday, December 25, 2010

सरकार, आखिर कुछ करते क्यों नहीं?

पिछले दिनों प्याज का दाम सातवें आसमान पर पहुंच गया। मेरे एक मित्र ने मजाक में ही कहा कि डायटिंग करने का यही सही वक्त है। महंगाई का मारा आम आदमी बेचारा कर भी क्या सकता है। आम आदमी के सरकार राज ने पहले ही दाल को आम आदमी की थाली से गायब कर दिया। पहले तो कहते थे कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ लेकिन यह तो अब कहावत बन कर ही रह गया है। गरीब आदमी प्याज और रोटी खाकर ही संतुष्ट हो जाया करता था लेकिन अब तो प्याज खाना भी विलासिता हो गया है। अब तो लहसुन, टमाटर आदि सब्जियां भी प्याज की ही राह पर चल रहे हैं।

सरकार को देखिए कृषि मंत्री जहां फसलों की बर्बादी को इसकी वजह बताते रहे वहीं नेफेड के अधिकारी इससे इन्कार करते रहे। दिल्ली सरकार ने जमाखोरों को एक दिन का मोहलत ही दे दिया कि जितना कालाबाजारी कर सकते हो कर लो कार्यवाही तो कल से की जाएगी। वहीं प्रधानमंत्री ने कृषि मंत्री को चिट्ठी लिख कर जानना चाहा कि महंगाई की वजह क्या है? यह बात समझ से परे है कि संचार क्रांति के युग में आम जनता के हित से जुड़े मसले पर कृषि मंत्री से सीधे बात नहीं की जा सकती थी और उन्हें सख्त निर्देश नहीं दिए गए? इसमें चिठ्ठी लिखकर जवाब का इंतजार क्यों किया गया? आज हिंदुस्तान में भी यह खबर छपी थी कि 'पीएम ने पूछा प्याज महंगा क्यों'। सवाल-जवाब का सिलसिला आखिर कब तक चलता रहेगा। सरकार आखिर कब कुछ करेगी या करेगी भी कि नहीं?

डेढ़-दो साल पहले जब महंगाई बढी थी तो कहा गया कि खराब मानसून की वजह से ऐसा हुआ है लेकिन दो साल बाद भी महंगाई पर लगाम क्यों नहीं लगा। इस बार तो बारिश भी अच्छी हुई और फसल भी अच्छा हुआ। क्या सरकार के पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जिससे पता चले कि फसलों के स्टाक कितने हैं उसकी मांग कितनी है और उसकी आपूर्ती कितनी है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब कीमतें आसमान छू जाती हैं तब सरकार निर्यात पर रोक लगाती है और आयात करने की सोंचती है। कहीं इसमें भी तो कोई बड़ा घोटाला नहीं छुपा है?

अगर सरकार के पास कोई सिस्टम नहीं है तो वह इसे डेवलप करने का प्रयास क्यों नहीं करती। आखिर कहीं तो फसलें इतनी अधिक हो जाती हैं कि उन्हें रखने या ढोने पर ही अधिक खर्च हो जाता है और वह खेत में ही पड़ी-पड़ी या फिर गोदामों में सही रख-रखाव के अभाव में सड़ जाती हैं और कहीं तो उनकी किल्लत ही रहती है। इससे तो नुकसान किसानों और आम आदमी को ही होता है। कुछ मुट्ठी भर बिचौलिए सारा फायदा उठाते हैं और सारा सरकारी तंत्र इन्ही मुट्ठी भर बिचौलियों की मुट्ठी में कैद रहते हैं।

कृषि मंत्री के रूप में शरद पवार जी की उपलब्धि क्या रही है?पवार साहब सिर्फ भविष्यवाणियां करते हैं। दाम बढ़ने वाली भविष्यवाणियां सही हो जाती हैं और घटने वाली गलत। आज ही एक कार्टून देखा जिसमें एक व्यक्ति कह रहा है कि कृषि मंत्री के बयान में प्याज से ज्यादा परतें होती हैं। पवार साहब के गृह राज्य में ही रोज जाने कितने किसान आत्महत्या कर लेते हैं। मगर उनका क्या किसान मरते हैं तो मरें अपनी बला से वह तो ऐसे ही अपने स्टाइल में कृषि (मंत्रालय) और क्रिकेट की जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे। आखिर किसकी हिम्मत है कि उनसे इस्तिफा ले ले या उनका मंत्रालय बदल दे आखिर सरकार भी तो चलानी है और आखिर आम आदमी के लिए कहीं कोई मंत्री बदले जाते हैं। कभी प्याज और टमाटर के लिए सरकार बदल दी जाती थी, लेकिन अब लोग अपनी ही परेशानियों से इतना अधिक पक चुके हैं कि सब कुछ नियति मान कर स्वीकार कर लेते हैं। शायद आम आदमी के मन में यह सवाल चल रहा होगा कि 'आम-आदमी के इस सरकार राज हमें क्या मिला' और सरकार, हमारे लिए कुछ करते क्यों नहीं?

Tuesday, November 30, 2010

जनता की जीत

आजकल बरबस एक गाना मेरे जुबान पर आ जाता, ‘जग सूना-सूना लागे जग सूना-सूना लागे छन से जो टूटे कोई सपना’। ये गाना लालू और पासवान जी के लिए भी सही है। भैंस के सिंग से सीएम की सीट पर बैठने वाले लालू जी का सपना एक दिन प्रधानमंत्री बनने का भी था। इस चुनाव में वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। बिहार विधानसभा चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण थे। जहां लालू और पासवान के लिए चुनाव जीत कर राजनीतिक वनवास से वापसी करने का मौका था वही हार का मतलब था राजनीतिक जीवन खत्म होना। नीतीश के लिए भी हार का मतलब होता राजनीतिक जीवन का अंत। क्योंकि तीनों ही नेता 65 वर्ष से ऊपर के हैं और पांच साल बाद 70 के पार हो जाएंगे। इस उम्र में वो ऊर्जा नहीं रह जाती है जो कि संघर्ष के दिनों में होती है। फिर हार का मतलब होता है कि सारे राजनीतिक और जाति समीकरण का ध्वस्त होना। जैसा कि इन चुनावों में हुआ भी। सारे के सारे समीकरण धरे के धरे रह गए लालू को यादवों ने और पासवान को दलित मतदाताओं ने नकार दिया, जनता ने परिवारवाद, जातिवाद और बाहुबलियों को नकार दिया, राहुल का कोई जादू नहीं चला दूसरी ओर मुसलमानों ने भाजपा को भी वोट दे दिया जिसका भूत उन्हें दिखाया जाता था। इन चुनावों में सबसे अधिक फायदा भाजपा को ही तो हुआ।

आखिर ऐसा क्यों हो गया? इन नतीजों के क्या मायने हैं? आगे बिहार और देश की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? 80 दशक के अंत और 90 दशक के पूर्वार्ध में देश का राजनीतिक मिजाज कुछ अलग ही हुआ करता था। एगर एक तरीके से कहें तो कांग्रेस अवसान पर थी,जेपी आंदोलन से तपे-तपाए छात्र नेता बिहार के राजनीतिक आकाश पर चमकने के लिए तैयार थे। मंडल और कमंडल की राजनीति उठान पर थी, वर्षों से दबाए गए लोगों की चेतना अब ज्वालामुखी की तरह फटने के लिए तैयार थी। इसी समय लालू यादव के रूप में एक ऐसे नेता का उदय हुआ जो पिछड़ों और गरीबों के लिए जननायक के रूप में उभरा। उसने वर्षों से समाज में सताए लोगों को जुबान दी। समाजिक न्याय का नया नारा बिहार की राजनीति में इतना अहम हो गया कि इसके आगे सारे नारे फिके हो गए। जनता ने लालू को इसका इनाम सर-आंखों पर बिठा के दिया। लेकिन सत्ता का नशा ही कुछ ऐसा होता है कि यह तभी उतरता है जब खोने के लिए कुछ भी नहीं बचता। लालू चापलूसों से घिरते गए, लालू चालिसा लिखने वाले और लालू के लिए कबाब बनाने वाले लोग पुरस्कारों से नवाजे जाते रहे। एक तरफ देश उदारीकरण और आर्थिक सुधारों के रथ पर सवार होकर आगे बढ़ रहा था तो दूसरी और लालू बिहार के विकास का चक्का को रोके हुए थे। लालू एक विदूषक ही बन कर रह गए। लालू की एक बड़ी गलती यह भी रही कि उन्होंने जनता को अपना जागीर समझ लिया। पहले अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाया फिर इस चुनाव में अपने बेटे को भी आगे करने का प्रयास किया। ठीक ही तो कहते हैं कि जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है। लालू-राबड़ी राज में खुलेआम गुंडागर्दी, अपहरण, जातीय नरसंहार क्या-नहीं हुआ, लेकिन इससे बेफिक्र लालू अपनी ही वंशी बजा रहे थे। आखिर सिर्फ खोखले वादों से ही तो जनता का पेट नहीं भरता।

पासवान को ही लें कभी हाजीपुर से रिकार्ड मतों से जीतने वाले पासवान पिछले लोकसभा चुनाव में हार गए। पासवान जी एक राष्ट्रीय नेता से क्षेत्रीय नेता बन कर रह गए। पासवान ने भी अपने बंधु-बांधवों को आगे बढ़ाया। उनकी छवि एक अवसरवादी की भी बन गई जो एनडीए सरकार में भी मंत्री बनते हैं और यूपीए की सरकार में भी। 2005 के मार्च में रामविलास विलास पासवान लालू के खिलाफ चुनाव अभियान किया था। चुनाव परिणाम आने के बाद सत्ता की चाबी उनके पास ही थी वो जिसे चाहते उस दल की सरकार बन सकती थी। लेकिन वो एक झूठी जिद पर अड़ गए कि मुख्यमंत्री मुस्लिम ही होना चाहिए जबकि उनके पार्टी से भी एक भी मुस्लिम चुन कर नहीं आया था। इस जिद की वजह से बिहार को एक बार फिर चुनाव का सामना करना पड़ा था और इसकी बड़ी कीमत पासवान ने चुकाई थी लेकिन पासवान ने अपनी गलती से कोई सबक नहीं लिया और अगले लोकसभा चुनाव में उसी लालू से गठबंधन कर बैठे जिसे हटाने के लिए उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा था। परिणाम यह हुआ कि अपने ही अखाड़े में अभी तक अजेय पासवान चारो खाने चित हो गए। अपने अखाड़े में पटकनी से चोट भी अधिक लगता है लेकिन पासवान यहां भी नहीं संभले। गद्दी की चाहत उन्हें इतनी अधिक थी कि लालू के सहयोग से वह राज्य सभा पहुंच गए। उन्होंने यह भी दिखाने की कोशीश की कि वह केंद्र में मंत्री पद का त्याग कर रहे हैं जबकि उन्हें केंद्र में कौन पूछने वाला था। बिहार में जो बयार बह रही थी उसके साथ होने के बजाय वह उसका रास्ता रोकने के लिए खड़े हो गए। फिर क्या था बयार जब चक्रवात का रूप ले लिया तो अपने साथ सभी को उड़ाते ले गई।

आजादी के बाद से कुछ मौकों को छोड़ दें तो 1989 तक बिहार में कांग्रेस की ही सरकार रही लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने किसी सरकार को स्थिर नहीं होने दिया। किसी भी देश या राज्य के विकास के लिए राजनीतिक स्थिरता एक बड़ी शर्त होती है। उस समय केंद्र और राज्य में कांग्रेस की ही सरकार थी लेकिन विकास की दौड़ से बिहार पिछड़ता रहा। वर्षों से दबी जातीय-सामाजिक चेतना अब अंगड़ाई ले रही थी। जनता बदलाव चाहती थी और हुआ भी वही। इस समय केंद्र में भी कांग्रेस की स्थिति कमजोर थी। कांग्रेस की नीति रही है कि किसी भी नेता का कद बढ़ रहा हो तो उसे काट दो। कोई पेड़ तब तक मजबूती से टिका रह सकता है जब उसके नीचे घास-फूस और छोटे-छोटे पेंड़-पौधे भी रहे। इससे उस पेंड़ की मिट्टी सुरक्षित रहती है और जड़ मजबूत होता है लेकिन गांधी परिवार ने अपने सामने किसी को पनपने ही नहीं दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस रूपी बरगद गिरने लगी। कांग्रेस ने लालू का सहयोग किया, 2005 में एनडीए की सरकार को रोकने के लिए विधानसभा भंग करवा दी गई। इसका असर तो होना ही था।

इस बार के चुनाव में दो गठबंधन आमने-सामने थे और कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी। कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला तो सही था लेकिन उसने समय रहते इसकी तैयारी नहीं की कांग्रेस में राजद और अन्य पार्टियों से निकले बाहुबलियों को टिकट दे दिया गया। समय रहते उम्मीदवारों के नाम की घोषणा नहीं की गई जिससे वो सही से चुनाव प्रचार नहीं कर पाए। चुनाव से पहले मुसलमानों और अगड़ी जातियों का रूझान कांग्रेस की तरफ बढ़ रहा था लेकिन कांग्रेस इसका फायदा नहीं उठा पाई। कांग्रेस की छवि वोटकटवा की ही हो कर रह गई। दूसरी ओर लोगों को लगा कि कांग्रेस अगर कुछ सीट जीत भी जाती है तो वह फिर से लालू का समर्थन कर सकती है और अगर नहीं जीती तो वोट बंटने के कारण लालू को फायदा हो सकता है। नीतीश ने भी लोगों को लालू के जंगलराज की वापसी का भय दिखाया। इससे फिर से लोग नीतीश के पक्ष में लामबंद हो गए।
ऐसा नहीं है कि नीतीश ने बिहार का की कायाकल्प कर दिया। बिहार बाढ़ और सुखाड़ से परेशान है, राज्य में अभी भी निवेश नहीं हुआ है न कोई फैक्ट्री लगी है। बंद पड़े चीनी मिल भी नहीं खुले हैं। बिजली की हालत खराब है। शिक्षा के क्षेत्र में भले ही स्कूलों का स्तर सुधरा है, लड़कियों को साईकिल दी जा रही है इससे स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है लेकिन सिर्फ नंबर के आधार पर शिक्षकों की बहाली से शिक्षा का स्तर गिरा है। लेकिन बिहार के लोगों में एक फिल गुड़ फैक्टर काम कर रहा है। जहां वर्षों से कोई विकास न हो वहां थोड़ा सा भी विकास होना बड़ा लगता है। अपराध पर लगाम लगा है और लोग खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसलिए जनता नीतीश को एक और मौका देना चाहती थी। दूसरे नीतीश ने महिलाओं के लिए योजनाएं चलाकर और उन्हें आरक्षण देकर , भागलपुर दंगों के दोषियों को सजा दिलवाकर अपने समर्थकों की संख्या बढ़वा ली। साथ ही महादलित कार्ड खेलकर विरोधियों के मतों में भी सेंध लगा दिया।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि इतनी बड़ी सफलता के बाद आगे क्या होगा? बिहार में विपक्ष को ऐसी पटकनी मिली है कि वह उठने के बजाय हो सकता है कि मर ही न जाए। ऐसी स्थिति में क्या होगा? लोकतंत्र की सफलता के लिए मजबूत विपक्ष का होना भी बेहद जरूरी है। नहीं तो शासक तो तानाशाह बनने में देर नहीं लगती। नीतीश कुमार से न बनने के कारण पहले भी कई नेता उनसे अलग हो चुके हैं। भाजपा जेडीयू की छाया मात्र बन कर रह गई है। सरकार में अफसरशाही बढ़ी है और अफसरों के आगे मंत्रियों की भी कुछ नहीं चलती। जेडीयू परिस्कृत राजद बन कर रह गया है क्योंकि राजद से बहुत सारे नेता अपनी वफादारी त्याग कर नीतीश के साथ हो गए। जो लोग पहले लालू के जंगल राज के सिपाही थे वही लोग अब नीतीश के सुसाशन के रखवाले हो गए। बिहार में अपराध पर लगाम तो लगा लेकिन उन्हीं आपरधिक तत्वों पर प्रशासन का कोड़ा चला जिन्होंने नीतीश के आगे समर्पन कर दिया।

नीतीश से लिए इस अप्रत्याशित चुनाव परिणाम के बाद उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। पहले तो तुलना पंद्रह साल बनाम पांच साल का था। अब तो उनके पहले कार्यकाल के काम से ही तुलना की जाएगी। विकास और सुशासन के जिस नारे के साथ उन्होंने सत्ता में जो वापसी की है उसके नए मानक बनाने होंगे और उनपर खरा उतरना होगा। क्योंकि जनता अगर किसी को पलकों पर बिठाती है तो उसे धूल में मिलाते भी देर नहीं लगती। साथ ही बिहार को एक ऐसे युवा नेता की भी तलाश होगी जो नीतीश का विकल्प बनकर बिहार को नए युग में ले जा सके।

Saturday, October 30, 2010

डर के साथ ही जीत है


पिछले दिनों की बात है मेरे ऑफिस की दीवार पर कई टीवी चैनल टंगे हैं जिनपर अलग-अलग न्यूज चैनल दिखते रहते हैं। टीवी पर कुछ यूं खबर चल रही थी, पारे ने परेशान किया, बारिश ने किया बेहाल अब दिल्ली वालो हो जाओ सावधान ! जाड़ा जमा देगा, जाड़ा ले लेगा आपकी जान। मौसम मिलावट आदि से संबंधित कुछ इसी तरह की खबर आपको न्यूज चैनल खोलते ही डराने के लिए तैयार मिलते हैं। इनमें अनुप्राश और अलंकार के प्रयोग जमकर किए जाते हैं। एक ही बात को कई तरह से कहा जाता है। कुछ प्रोग्राम के आधार वाक्य ही हैं "चैन से सोना है तो जाग जाओ। जाहिर है कि डर बिकता है।

आखिर हम न्यूज क्यों देखते हैं? पेपर क्यों पढ़ते हैं? इसकी वजह है हमारे भीतर का डर जिसे 'फीयर ऑफ अननोन' कहते हैं। मतलब हमें हमेशा अज्ञात से ही एक खतरा महसूस होता है और हम किसी भी संभावित खतरे से बचाव के लिए हमेशा अपडेट रहना चाहते हैं ताकि उससे बचाव के लिए हर संभव उपाय कर सकें। यही कारण है कि डर बिकता है।
आजकल टीवी पर डराने वाले प्रोग्रामों की बाढ़ सी आ गई है जो जितना डराएगा वो उतना टीआरपी पाएगा और जो जितना टीआरपी पाएगा वो उतना ही अधिक विज्ञापन बटोरेगा। आजकल खबरों की परिभाषा टीआरपी तय करते हैं। जो भी बिक जाए वो खबर है। जितना बड़ा डर उतनी बड़ी खबर क्योंकि डर सबको लगता है और डर की टीआरपी होती है। इसलिए जब शनि और मंगल ग्रह की स्थिति एक साथ रहती है तो यह बड़ी खबर बनती है और इस पर घंटे भर का प्रोग्राम बनता है।
अगर गौर करें तो पाएंगे कि न्यूज चैनल नकारात्मक बातें अधिक दिखाते हैं। चाहे 2012 में धरती का अंत की खबर हो या महामशीन से महाविनाश की खबर हो या पड़ोसी देश से खतरे की जरा भी अंदेशा हो हर खबर में आपको नकारात्मक पक्ष साफ दिखेगा। खेल में जब टीम मैदान मार रही हो तब की बात को छोड़ दें वरना हार मिलते ही संभल जाओ धोनी, धोनी के धुरंघर धाराशाही, धुल गए धोनी जैसी स्टोरी चलने में जरा भी देर नहीं लगती। आज के दौर में मीडिया की विश्वसनीयता भले ही कम हुई हो लेकिन इसका समाज पर अभी भी बड़ा प्रभाव है। यही कारण है कि हम भले ही मीडिया की हंसी उड़ाते हैं लेकिन ज्योतिष और धर्म-कर्म के प्रोग्राम देखना नहीं भूलते। महामशीन से महाविनाश की खबर हो तो माथे पर चिंता की लकीरें साफ हो जाती हैं। टीवी चैनल यह तो दिखाते हैं कि जानलेवा है लौकी, जहरीली लौकी से जरा संभल कर, खून के आंसू रूलाएगी यह लौकी लेकिन वह किसानों की समस्या को दिखलाना भूल जाते हैं। जब महामशीन को चला कर ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य को जानने का प्रयास किया जाता है तो इसके सकारात्मक पक्ष को नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्योंकि दर्शकों को अगर सब कुछ अच्छा ही दिखाया जाए और उसे फील गुड कराया जाए तो वह तो चैन की नींद सो जाएगा फिर न्यूज चैनल कौन देखेगा। इसलिए न्यूज चैनलों का यही मूल मंत्र है 'डर के साथ ही जीत है'।

Thursday, September 23, 2010

अयोध्या मुद्दे पर सबकी नजर

कल अयोध्या मामले पर हाईकोर्ट का फैसला आना है। लेकिन इस संभावित फैसले की आहट पहले से ही सुनाई देने लगी है। हर तरफ इसको लेकर चर्चा की जा रही हैं। कहीं बेबाक तौर पर तो कहीं दबी जुबान में। इस फैसले को लेकर कई सवाल भी हैं जैसे कि जिस समुदाय के विपक्ष में यह फैसला जाएगा वह इसे मानेगा या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा? दूसरा कि फैसले के बाद माहौल कैसा रहेगा। इसी बात को लेकर बहुत सारे लोग चिंतित हैं। हालांकि कुछ लोगों ने फैसला टलवाने की कोशिश भी की थी लेकिन अंतत: ऐसा कोई भी प्रयास सफल होता नहीं दिख रहा है।

देश अभी कई समस्याओं से जूझ रहा है। कश्मीर के हालात बेकाबू होते जा रहे हैं, देश के किसी हिस्से में बाढ़ तो किसी हिस्से में सूखा तबाही मचा रही है। नक्सली हिंसा और महंगाई की समस्या तो पहले से ही मुंह बाए खड़ी है। ऐसे में इस फैसले के बाद अगर माहौल को अगर जरा भी बिगड़ने दिया गया तो देश गलत दिशा में जा सकता है। हालांकि ऐसी कम ही संभावना है लेकिन उपद्रवी और फिरकापरस्त लोग हर जगह होते हैं और ये हमेशा मौके की ताक में रहते हैं। इसका एक उदाहरण इन दिनों एसएमएस के जरीए धार्मिक भावना भड़काने की की जा रही कोशिश है। हालांकि एक सुखद बात ये भी है कि एक तबका ऐसा भी है जो संदेश माध्यमों के जरीए भाईचारा बढ़ाने की बात कर रहा है।

अयोध्या विवाद काफी पुराना है। इस विवाद के इतिहास में तो मैं नहीं जाऊंगा लेकिन 89 में मस्जिद का ताला खुलना, कारसेवा का शुरू होना, मुलायम सरकार के दौरान कारसेवकों पर गोलीबारी, आडवाणी की रथ यात्रा और बाबरी मस्जिद का विध्वंस आदि की कुछ धुंधली तस्वीरें मेंरे जेहन में हैं। हजारो ऐसे बेगुनाह जिनके जीवन पर मंदिर-मस्जिद के बनने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था इस विवाद के कारण हुए दंगों की भेंट चढ़ गए। हर महिने लाखों-करोड़ रूपये सिर्फ विवादित स्थल की सुरक्षा में ही खर्च हो रहे हैं।

इस विवाद से कुछ हासिल तो नहीं हुआ हैं, उल्टे छीना ही बहुत कुछ है। जिन लोगों ने दंगे-फसादों के बीच डरे-डरे दिन बिताए आज भी इसके संभावित आहट से आज भी सहम जाते हैं। उस वक्त एक पटाखे के फूटना भी किसी बम विस्फोट सा लगता था। कहीं कोई हल्की शोर से भी लोग चौकन्ने हो जाते थे। आज भी मुझे याद है जब मैं स्कूल में था तभी कहीं किसी गाड़ी के टायर फटने से भगदड़ मच गया और हमें पीछे के रास्ते से सुरक्षित निकाला गया था। मेरा बचपन एक मुस्लिम की गोद में खेलते हुए बीता। वो बंगाली थे और उनका व्यापार पास ही के बाजार में था। लेकिन दंगे की डर से वो एक बार जो लौटे फिर वापस ही नहीं आए। बाद में उन्होंने अपने करींदों के माध्यम से अपना व्यापार समेट लिया।

अयोध्या पर फैसले और उसके बाद के माहौल को लेकर भले ही शंका-आशंका हो लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि माहौल बिगड़ेगा नहीं। तब से अब तक सरयू में काफी पानी बह चुका है। तब के बच्चे जिन्होंने डरे-सहमें इस फसाद को देखा अब बड़े हो गए हैं ये काफी समझदार भी हैं। तब के उन्मादी अब अधेड़ हो चुके हैं और उनका उन्माद भी अब शांत पड़ चुका है। सामाजिक ताने-बाने में भी काफी बदलाव आया है। लोग खुद ही इतनी समस्याओं से घिरे हैं और महंगाई और भ्रष्टाचार जिससे वो रोज दो-चार होते हैं उसके विरोध में भी सड़कों पर नहीं उतरते हैं। लोग तो बस शांति चाहते हैं।

अयोध्या विवाद के समाधान को लेकर भले ही लोगों के मन में कोई संदेह हो लेकिन महाराजगंज के धुसवां कला गांव के निवासियों नें लोगों के सामने एक अनूठी ही मिसाल पेश की है। इस गांव में स्थित मलंग बाबा के दरगाह की चाहारदीवारी के निर्णाण के लिए जब नींव खोदी जा रही थी तो नीचे से शिवलिंग निकला। इसकी खबर पाते ही हिंदू वाहिनी के सदस्य वहां पहुंचने लगे। लेकिन गांव के हिंदुओं ने उन्हे साफ कह दिया कि नेता लोग चले जाएं, गांव के लोग खुद इस मामले में फैसला लेंगे। बाद में दोनों समुदायों के लोगों ने मिल बैठ कर फैसला लिया कि दरगाह के आधे हिस्से का जीर्णोद्धार होगा जबकि आधे हिस्से में शिव मंदिर होगा।

अभी तो हाईकोर्ट का फैसला आना है जैसाकि उम्मीद है कि आगे सुप्रीम कोर्ट में मामला जा सकता है। इस मामले ने अभी तक लोगों से जितना छीना है वो तो नहीं लौटाया जा सकता लेकिन अयोध्या धार्मिक एकता की मिसाल बन सकता है। बशर्ते अयोध्या के लोगों को ही मिल बैठकर इस विवाद को सुलझाने दें।