Saturday, December 25, 2010

सरकार, आखिर कुछ करते क्यों नहीं?

पिछले दिनों प्याज का दाम सातवें आसमान पर पहुंच गया। मेरे एक मित्र ने मजाक में ही कहा कि डायटिंग करने का यही सही वक्त है। महंगाई का मारा आम आदमी बेचारा कर भी क्या सकता है। आम आदमी के सरकार राज ने पहले ही दाल को आम आदमी की थाली से गायब कर दिया। पहले तो कहते थे कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ लेकिन यह तो अब कहावत बन कर ही रह गया है। गरीब आदमी प्याज और रोटी खाकर ही संतुष्ट हो जाया करता था लेकिन अब तो प्याज खाना भी विलासिता हो गया है। अब तो लहसुन, टमाटर आदि सब्जियां भी प्याज की ही राह पर चल रहे हैं।

सरकार को देखिए कृषि मंत्री जहां फसलों की बर्बादी को इसकी वजह बताते रहे वहीं नेफेड के अधिकारी इससे इन्कार करते रहे। दिल्ली सरकार ने जमाखोरों को एक दिन का मोहलत ही दे दिया कि जितना कालाबाजारी कर सकते हो कर लो कार्यवाही तो कल से की जाएगी। वहीं प्रधानमंत्री ने कृषि मंत्री को चिट्ठी लिख कर जानना चाहा कि महंगाई की वजह क्या है? यह बात समझ से परे है कि संचार क्रांति के युग में आम जनता के हित से जुड़े मसले पर कृषि मंत्री से सीधे बात नहीं की जा सकती थी और उन्हें सख्त निर्देश नहीं दिए गए? इसमें चिठ्ठी लिखकर जवाब का इंतजार क्यों किया गया? आज हिंदुस्तान में भी यह खबर छपी थी कि 'पीएम ने पूछा प्याज महंगा क्यों'। सवाल-जवाब का सिलसिला आखिर कब तक चलता रहेगा। सरकार आखिर कब कुछ करेगी या करेगी भी कि नहीं?

डेढ़-दो साल पहले जब महंगाई बढी थी तो कहा गया कि खराब मानसून की वजह से ऐसा हुआ है लेकिन दो साल बाद भी महंगाई पर लगाम क्यों नहीं लगा। इस बार तो बारिश भी अच्छी हुई और फसल भी अच्छा हुआ। क्या सरकार के पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जिससे पता चले कि फसलों के स्टाक कितने हैं उसकी मांग कितनी है और उसकी आपूर्ती कितनी है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब कीमतें आसमान छू जाती हैं तब सरकार निर्यात पर रोक लगाती है और आयात करने की सोंचती है। कहीं इसमें भी तो कोई बड़ा घोटाला नहीं छुपा है?

अगर सरकार के पास कोई सिस्टम नहीं है तो वह इसे डेवलप करने का प्रयास क्यों नहीं करती। आखिर कहीं तो फसलें इतनी अधिक हो जाती हैं कि उन्हें रखने या ढोने पर ही अधिक खर्च हो जाता है और वह खेत में ही पड़ी-पड़ी या फिर गोदामों में सही रख-रखाव के अभाव में सड़ जाती हैं और कहीं तो उनकी किल्लत ही रहती है। इससे तो नुकसान किसानों और आम आदमी को ही होता है। कुछ मुट्ठी भर बिचौलिए सारा फायदा उठाते हैं और सारा सरकारी तंत्र इन्ही मुट्ठी भर बिचौलियों की मुट्ठी में कैद रहते हैं।

कृषि मंत्री के रूप में शरद पवार जी की उपलब्धि क्या रही है?पवार साहब सिर्फ भविष्यवाणियां करते हैं। दाम बढ़ने वाली भविष्यवाणियां सही हो जाती हैं और घटने वाली गलत। आज ही एक कार्टून देखा जिसमें एक व्यक्ति कह रहा है कि कृषि मंत्री के बयान में प्याज से ज्यादा परतें होती हैं। पवार साहब के गृह राज्य में ही रोज जाने कितने किसान आत्महत्या कर लेते हैं। मगर उनका क्या किसान मरते हैं तो मरें अपनी बला से वह तो ऐसे ही अपने स्टाइल में कृषि (मंत्रालय) और क्रिकेट की जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे। आखिर किसकी हिम्मत है कि उनसे इस्तिफा ले ले या उनका मंत्रालय बदल दे आखिर सरकार भी तो चलानी है और आखिर आम आदमी के लिए कहीं कोई मंत्री बदले जाते हैं। कभी प्याज और टमाटर के लिए सरकार बदल दी जाती थी, लेकिन अब लोग अपनी ही परेशानियों से इतना अधिक पक चुके हैं कि सब कुछ नियति मान कर स्वीकार कर लेते हैं। शायद आम आदमी के मन में यह सवाल चल रहा होगा कि 'आम-आदमी के इस सरकार राज हमें क्या मिला' और सरकार, हमारे लिए कुछ करते क्यों नहीं?

Tuesday, November 30, 2010

जनता की जीत

आजकल बरबस एक गाना मेरे जुबान पर आ जाता, ‘जग सूना-सूना लागे जग सूना-सूना लागे छन से जो टूटे कोई सपना’। ये गाना लालू और पासवान जी के लिए भी सही है। भैंस के सिंग से सीएम की सीट पर बैठने वाले लालू जी का सपना एक दिन प्रधानमंत्री बनने का भी था। इस चुनाव में वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। बिहार विधानसभा चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण थे। जहां लालू और पासवान के लिए चुनाव जीत कर राजनीतिक वनवास से वापसी करने का मौका था वही हार का मतलब था राजनीतिक जीवन खत्म होना। नीतीश के लिए भी हार का मतलब होता राजनीतिक जीवन का अंत। क्योंकि तीनों ही नेता 65 वर्ष से ऊपर के हैं और पांच साल बाद 70 के पार हो जाएंगे। इस उम्र में वो ऊर्जा नहीं रह जाती है जो कि संघर्ष के दिनों में होती है। फिर हार का मतलब होता है कि सारे राजनीतिक और जाति समीकरण का ध्वस्त होना। जैसा कि इन चुनावों में हुआ भी। सारे के सारे समीकरण धरे के धरे रह गए लालू को यादवों ने और पासवान को दलित मतदाताओं ने नकार दिया, जनता ने परिवारवाद, जातिवाद और बाहुबलियों को नकार दिया, राहुल का कोई जादू नहीं चला दूसरी ओर मुसलमानों ने भाजपा को भी वोट दे दिया जिसका भूत उन्हें दिखाया जाता था। इन चुनावों में सबसे अधिक फायदा भाजपा को ही तो हुआ।

आखिर ऐसा क्यों हो गया? इन नतीजों के क्या मायने हैं? आगे बिहार और देश की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? 80 दशक के अंत और 90 दशक के पूर्वार्ध में देश का राजनीतिक मिजाज कुछ अलग ही हुआ करता था। एगर एक तरीके से कहें तो कांग्रेस अवसान पर थी,जेपी आंदोलन से तपे-तपाए छात्र नेता बिहार के राजनीतिक आकाश पर चमकने के लिए तैयार थे। मंडल और कमंडल की राजनीति उठान पर थी, वर्षों से दबाए गए लोगों की चेतना अब ज्वालामुखी की तरह फटने के लिए तैयार थी। इसी समय लालू यादव के रूप में एक ऐसे नेता का उदय हुआ जो पिछड़ों और गरीबों के लिए जननायक के रूप में उभरा। उसने वर्षों से समाज में सताए लोगों को जुबान दी। समाजिक न्याय का नया नारा बिहार की राजनीति में इतना अहम हो गया कि इसके आगे सारे नारे फिके हो गए। जनता ने लालू को इसका इनाम सर-आंखों पर बिठा के दिया। लेकिन सत्ता का नशा ही कुछ ऐसा होता है कि यह तभी उतरता है जब खोने के लिए कुछ भी नहीं बचता। लालू चापलूसों से घिरते गए, लालू चालिसा लिखने वाले और लालू के लिए कबाब बनाने वाले लोग पुरस्कारों से नवाजे जाते रहे। एक तरफ देश उदारीकरण और आर्थिक सुधारों के रथ पर सवार होकर आगे बढ़ रहा था तो दूसरी और लालू बिहार के विकास का चक्का को रोके हुए थे। लालू एक विदूषक ही बन कर रह गए। लालू की एक बड़ी गलती यह भी रही कि उन्होंने जनता को अपना जागीर समझ लिया। पहले अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाया फिर इस चुनाव में अपने बेटे को भी आगे करने का प्रयास किया। ठीक ही तो कहते हैं कि जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है। लालू-राबड़ी राज में खुलेआम गुंडागर्दी, अपहरण, जातीय नरसंहार क्या-नहीं हुआ, लेकिन इससे बेफिक्र लालू अपनी ही वंशी बजा रहे थे। आखिर सिर्फ खोखले वादों से ही तो जनता का पेट नहीं भरता।

पासवान को ही लें कभी हाजीपुर से रिकार्ड मतों से जीतने वाले पासवान पिछले लोकसभा चुनाव में हार गए। पासवान जी एक राष्ट्रीय नेता से क्षेत्रीय नेता बन कर रह गए। पासवान ने भी अपने बंधु-बांधवों को आगे बढ़ाया। उनकी छवि एक अवसरवादी की भी बन गई जो एनडीए सरकार में भी मंत्री बनते हैं और यूपीए की सरकार में भी। 2005 के मार्च में रामविलास विलास पासवान लालू के खिलाफ चुनाव अभियान किया था। चुनाव परिणाम आने के बाद सत्ता की चाबी उनके पास ही थी वो जिसे चाहते उस दल की सरकार बन सकती थी। लेकिन वो एक झूठी जिद पर अड़ गए कि मुख्यमंत्री मुस्लिम ही होना चाहिए जबकि उनके पार्टी से भी एक भी मुस्लिम चुन कर नहीं आया था। इस जिद की वजह से बिहार को एक बार फिर चुनाव का सामना करना पड़ा था और इसकी बड़ी कीमत पासवान ने चुकाई थी लेकिन पासवान ने अपनी गलती से कोई सबक नहीं लिया और अगले लोकसभा चुनाव में उसी लालू से गठबंधन कर बैठे जिसे हटाने के लिए उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा था। परिणाम यह हुआ कि अपने ही अखाड़े में अभी तक अजेय पासवान चारो खाने चित हो गए। अपने अखाड़े में पटकनी से चोट भी अधिक लगता है लेकिन पासवान यहां भी नहीं संभले। गद्दी की चाहत उन्हें इतनी अधिक थी कि लालू के सहयोग से वह राज्य सभा पहुंच गए। उन्होंने यह भी दिखाने की कोशीश की कि वह केंद्र में मंत्री पद का त्याग कर रहे हैं जबकि उन्हें केंद्र में कौन पूछने वाला था। बिहार में जो बयार बह रही थी उसके साथ होने के बजाय वह उसका रास्ता रोकने के लिए खड़े हो गए। फिर क्या था बयार जब चक्रवात का रूप ले लिया तो अपने साथ सभी को उड़ाते ले गई।

आजादी के बाद से कुछ मौकों को छोड़ दें तो 1989 तक बिहार में कांग्रेस की ही सरकार रही लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने किसी सरकार को स्थिर नहीं होने दिया। किसी भी देश या राज्य के विकास के लिए राजनीतिक स्थिरता एक बड़ी शर्त होती है। उस समय केंद्र और राज्य में कांग्रेस की ही सरकार थी लेकिन विकास की दौड़ से बिहार पिछड़ता रहा। वर्षों से दबी जातीय-सामाजिक चेतना अब अंगड़ाई ले रही थी। जनता बदलाव चाहती थी और हुआ भी वही। इस समय केंद्र में भी कांग्रेस की स्थिति कमजोर थी। कांग्रेस की नीति रही है कि किसी भी नेता का कद बढ़ रहा हो तो उसे काट दो। कोई पेड़ तब तक मजबूती से टिका रह सकता है जब उसके नीचे घास-फूस और छोटे-छोटे पेंड़-पौधे भी रहे। इससे उस पेंड़ की मिट्टी सुरक्षित रहती है और जड़ मजबूत होता है लेकिन गांधी परिवार ने अपने सामने किसी को पनपने ही नहीं दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस रूपी बरगद गिरने लगी। कांग्रेस ने लालू का सहयोग किया, 2005 में एनडीए की सरकार को रोकने के लिए विधानसभा भंग करवा दी गई। इसका असर तो होना ही था।

इस बार के चुनाव में दो गठबंधन आमने-सामने थे और कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी। कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला तो सही था लेकिन उसने समय रहते इसकी तैयारी नहीं की कांग्रेस में राजद और अन्य पार्टियों से निकले बाहुबलियों को टिकट दे दिया गया। समय रहते उम्मीदवारों के नाम की घोषणा नहीं की गई जिससे वो सही से चुनाव प्रचार नहीं कर पाए। चुनाव से पहले मुसलमानों और अगड़ी जातियों का रूझान कांग्रेस की तरफ बढ़ रहा था लेकिन कांग्रेस इसका फायदा नहीं उठा पाई। कांग्रेस की छवि वोटकटवा की ही हो कर रह गई। दूसरी ओर लोगों को लगा कि कांग्रेस अगर कुछ सीट जीत भी जाती है तो वह फिर से लालू का समर्थन कर सकती है और अगर नहीं जीती तो वोट बंटने के कारण लालू को फायदा हो सकता है। नीतीश ने भी लोगों को लालू के जंगलराज की वापसी का भय दिखाया। इससे फिर से लोग नीतीश के पक्ष में लामबंद हो गए।
ऐसा नहीं है कि नीतीश ने बिहार का की कायाकल्प कर दिया। बिहार बाढ़ और सुखाड़ से परेशान है, राज्य में अभी भी निवेश नहीं हुआ है न कोई फैक्ट्री लगी है। बंद पड़े चीनी मिल भी नहीं खुले हैं। बिजली की हालत खराब है। शिक्षा के क्षेत्र में भले ही स्कूलों का स्तर सुधरा है, लड़कियों को साईकिल दी जा रही है इससे स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है लेकिन सिर्फ नंबर के आधार पर शिक्षकों की बहाली से शिक्षा का स्तर गिरा है। लेकिन बिहार के लोगों में एक फिल गुड़ फैक्टर काम कर रहा है। जहां वर्षों से कोई विकास न हो वहां थोड़ा सा भी विकास होना बड़ा लगता है। अपराध पर लगाम लगा है और लोग खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसलिए जनता नीतीश को एक और मौका देना चाहती थी। दूसरे नीतीश ने महिलाओं के लिए योजनाएं चलाकर और उन्हें आरक्षण देकर , भागलपुर दंगों के दोषियों को सजा दिलवाकर अपने समर्थकों की संख्या बढ़वा ली। साथ ही महादलित कार्ड खेलकर विरोधियों के मतों में भी सेंध लगा दिया।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि इतनी बड़ी सफलता के बाद आगे क्या होगा? बिहार में विपक्ष को ऐसी पटकनी मिली है कि वह उठने के बजाय हो सकता है कि मर ही न जाए। ऐसी स्थिति में क्या होगा? लोकतंत्र की सफलता के लिए मजबूत विपक्ष का होना भी बेहद जरूरी है। नहीं तो शासक तो तानाशाह बनने में देर नहीं लगती। नीतीश कुमार से न बनने के कारण पहले भी कई नेता उनसे अलग हो चुके हैं। भाजपा जेडीयू की छाया मात्र बन कर रह गई है। सरकार में अफसरशाही बढ़ी है और अफसरों के आगे मंत्रियों की भी कुछ नहीं चलती। जेडीयू परिस्कृत राजद बन कर रह गया है क्योंकि राजद से बहुत सारे नेता अपनी वफादारी त्याग कर नीतीश के साथ हो गए। जो लोग पहले लालू के जंगल राज के सिपाही थे वही लोग अब नीतीश के सुसाशन के रखवाले हो गए। बिहार में अपराध पर लगाम तो लगा लेकिन उन्हीं आपरधिक तत्वों पर प्रशासन का कोड़ा चला जिन्होंने नीतीश के आगे समर्पन कर दिया।

नीतीश से लिए इस अप्रत्याशित चुनाव परिणाम के बाद उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। पहले तो तुलना पंद्रह साल बनाम पांच साल का था। अब तो उनके पहले कार्यकाल के काम से ही तुलना की जाएगी। विकास और सुशासन के जिस नारे के साथ उन्होंने सत्ता में जो वापसी की है उसके नए मानक बनाने होंगे और उनपर खरा उतरना होगा। क्योंकि जनता अगर किसी को पलकों पर बिठाती है तो उसे धूल में मिलाते भी देर नहीं लगती। साथ ही बिहार को एक ऐसे युवा नेता की भी तलाश होगी जो नीतीश का विकल्प बनकर बिहार को नए युग में ले जा सके।

Saturday, October 30, 2010

डर के साथ ही जीत है


पिछले दिनों की बात है मेरे ऑफिस की दीवार पर कई टीवी चैनल टंगे हैं जिनपर अलग-अलग न्यूज चैनल दिखते रहते हैं। टीवी पर कुछ यूं खबर चल रही थी, पारे ने परेशान किया, बारिश ने किया बेहाल अब दिल्ली वालो हो जाओ सावधान ! जाड़ा जमा देगा, जाड़ा ले लेगा आपकी जान। मौसम मिलावट आदि से संबंधित कुछ इसी तरह की खबर आपको न्यूज चैनल खोलते ही डराने के लिए तैयार मिलते हैं। इनमें अनुप्राश और अलंकार के प्रयोग जमकर किए जाते हैं। एक ही बात को कई तरह से कहा जाता है। कुछ प्रोग्राम के आधार वाक्य ही हैं "चैन से सोना है तो जाग जाओ। जाहिर है कि डर बिकता है।

आखिर हम न्यूज क्यों देखते हैं? पेपर क्यों पढ़ते हैं? इसकी वजह है हमारे भीतर का डर जिसे 'फीयर ऑफ अननोन' कहते हैं। मतलब हमें हमेशा अज्ञात से ही एक खतरा महसूस होता है और हम किसी भी संभावित खतरे से बचाव के लिए हमेशा अपडेट रहना चाहते हैं ताकि उससे बचाव के लिए हर संभव उपाय कर सकें। यही कारण है कि डर बिकता है।
आजकल टीवी पर डराने वाले प्रोग्रामों की बाढ़ सी आ गई है जो जितना डराएगा वो उतना टीआरपी पाएगा और जो जितना टीआरपी पाएगा वो उतना ही अधिक विज्ञापन बटोरेगा। आजकल खबरों की परिभाषा टीआरपी तय करते हैं। जो भी बिक जाए वो खबर है। जितना बड़ा डर उतनी बड़ी खबर क्योंकि डर सबको लगता है और डर की टीआरपी होती है। इसलिए जब शनि और मंगल ग्रह की स्थिति एक साथ रहती है तो यह बड़ी खबर बनती है और इस पर घंटे भर का प्रोग्राम बनता है।
अगर गौर करें तो पाएंगे कि न्यूज चैनल नकारात्मक बातें अधिक दिखाते हैं। चाहे 2012 में धरती का अंत की खबर हो या महामशीन से महाविनाश की खबर हो या पड़ोसी देश से खतरे की जरा भी अंदेशा हो हर खबर में आपको नकारात्मक पक्ष साफ दिखेगा। खेल में जब टीम मैदान मार रही हो तब की बात को छोड़ दें वरना हार मिलते ही संभल जाओ धोनी, धोनी के धुरंघर धाराशाही, धुल गए धोनी जैसी स्टोरी चलने में जरा भी देर नहीं लगती। आज के दौर में मीडिया की विश्वसनीयता भले ही कम हुई हो लेकिन इसका समाज पर अभी भी बड़ा प्रभाव है। यही कारण है कि हम भले ही मीडिया की हंसी उड़ाते हैं लेकिन ज्योतिष और धर्म-कर्म के प्रोग्राम देखना नहीं भूलते। महामशीन से महाविनाश की खबर हो तो माथे पर चिंता की लकीरें साफ हो जाती हैं। टीवी चैनल यह तो दिखाते हैं कि जानलेवा है लौकी, जहरीली लौकी से जरा संभल कर, खून के आंसू रूलाएगी यह लौकी लेकिन वह किसानों की समस्या को दिखलाना भूल जाते हैं। जब महामशीन को चला कर ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य को जानने का प्रयास किया जाता है तो इसके सकारात्मक पक्ष को नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्योंकि दर्शकों को अगर सब कुछ अच्छा ही दिखाया जाए और उसे फील गुड कराया जाए तो वह तो चैन की नींद सो जाएगा फिर न्यूज चैनल कौन देखेगा। इसलिए न्यूज चैनलों का यही मूल मंत्र है 'डर के साथ ही जीत है'।

Thursday, September 23, 2010

अयोध्या मुद्दे पर सबकी नजर

कल अयोध्या मामले पर हाईकोर्ट का फैसला आना है। लेकिन इस संभावित फैसले की आहट पहले से ही सुनाई देने लगी है। हर तरफ इसको लेकर चर्चा की जा रही हैं। कहीं बेबाक तौर पर तो कहीं दबी जुबान में। इस फैसले को लेकर कई सवाल भी हैं जैसे कि जिस समुदाय के विपक्ष में यह फैसला जाएगा वह इसे मानेगा या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा? दूसरा कि फैसले के बाद माहौल कैसा रहेगा। इसी बात को लेकर बहुत सारे लोग चिंतित हैं। हालांकि कुछ लोगों ने फैसला टलवाने की कोशिश भी की थी लेकिन अंतत: ऐसा कोई भी प्रयास सफल होता नहीं दिख रहा है।

देश अभी कई समस्याओं से जूझ रहा है। कश्मीर के हालात बेकाबू होते जा रहे हैं, देश के किसी हिस्से में बाढ़ तो किसी हिस्से में सूखा तबाही मचा रही है। नक्सली हिंसा और महंगाई की समस्या तो पहले से ही मुंह बाए खड़ी है। ऐसे में इस फैसले के बाद अगर माहौल को अगर जरा भी बिगड़ने दिया गया तो देश गलत दिशा में जा सकता है। हालांकि ऐसी कम ही संभावना है लेकिन उपद्रवी और फिरकापरस्त लोग हर जगह होते हैं और ये हमेशा मौके की ताक में रहते हैं। इसका एक उदाहरण इन दिनों एसएमएस के जरीए धार्मिक भावना भड़काने की की जा रही कोशिश है। हालांकि एक सुखद बात ये भी है कि एक तबका ऐसा भी है जो संदेश माध्यमों के जरीए भाईचारा बढ़ाने की बात कर रहा है।

अयोध्या विवाद काफी पुराना है। इस विवाद के इतिहास में तो मैं नहीं जाऊंगा लेकिन 89 में मस्जिद का ताला खुलना, कारसेवा का शुरू होना, मुलायम सरकार के दौरान कारसेवकों पर गोलीबारी, आडवाणी की रथ यात्रा और बाबरी मस्जिद का विध्वंस आदि की कुछ धुंधली तस्वीरें मेंरे जेहन में हैं। हजारो ऐसे बेगुनाह जिनके जीवन पर मंदिर-मस्जिद के बनने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था इस विवाद के कारण हुए दंगों की भेंट चढ़ गए। हर महिने लाखों-करोड़ रूपये सिर्फ विवादित स्थल की सुरक्षा में ही खर्च हो रहे हैं।

इस विवाद से कुछ हासिल तो नहीं हुआ हैं, उल्टे छीना ही बहुत कुछ है। जिन लोगों ने दंगे-फसादों के बीच डरे-डरे दिन बिताए आज भी इसके संभावित आहट से आज भी सहम जाते हैं। उस वक्त एक पटाखे के फूटना भी किसी बम विस्फोट सा लगता था। कहीं कोई हल्की शोर से भी लोग चौकन्ने हो जाते थे। आज भी मुझे याद है जब मैं स्कूल में था तभी कहीं किसी गाड़ी के टायर फटने से भगदड़ मच गया और हमें पीछे के रास्ते से सुरक्षित निकाला गया था। मेरा बचपन एक मुस्लिम की गोद में खेलते हुए बीता। वो बंगाली थे और उनका व्यापार पास ही के बाजार में था। लेकिन दंगे की डर से वो एक बार जो लौटे फिर वापस ही नहीं आए। बाद में उन्होंने अपने करींदों के माध्यम से अपना व्यापार समेट लिया।

अयोध्या पर फैसले और उसके बाद के माहौल को लेकर भले ही शंका-आशंका हो लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि माहौल बिगड़ेगा नहीं। तब से अब तक सरयू में काफी पानी बह चुका है। तब के बच्चे जिन्होंने डरे-सहमें इस फसाद को देखा अब बड़े हो गए हैं ये काफी समझदार भी हैं। तब के उन्मादी अब अधेड़ हो चुके हैं और उनका उन्माद भी अब शांत पड़ चुका है। सामाजिक ताने-बाने में भी काफी बदलाव आया है। लोग खुद ही इतनी समस्याओं से घिरे हैं और महंगाई और भ्रष्टाचार जिससे वो रोज दो-चार होते हैं उसके विरोध में भी सड़कों पर नहीं उतरते हैं। लोग तो बस शांति चाहते हैं।

अयोध्या विवाद के समाधान को लेकर भले ही लोगों के मन में कोई संदेह हो लेकिन महाराजगंज के धुसवां कला गांव के निवासियों नें लोगों के सामने एक अनूठी ही मिसाल पेश की है। इस गांव में स्थित मलंग बाबा के दरगाह की चाहारदीवारी के निर्णाण के लिए जब नींव खोदी जा रही थी तो नीचे से शिवलिंग निकला। इसकी खबर पाते ही हिंदू वाहिनी के सदस्य वहां पहुंचने लगे। लेकिन गांव के हिंदुओं ने उन्हे साफ कह दिया कि नेता लोग चले जाएं, गांव के लोग खुद इस मामले में फैसला लेंगे। बाद में दोनों समुदायों के लोगों ने मिल बैठ कर फैसला लिया कि दरगाह के आधे हिस्से का जीर्णोद्धार होगा जबकि आधे हिस्से में शिव मंदिर होगा।

अभी तो हाईकोर्ट का फैसला आना है जैसाकि उम्मीद है कि आगे सुप्रीम कोर्ट में मामला जा सकता है। इस मामले ने अभी तक लोगों से जितना छीना है वो तो नहीं लौटाया जा सकता लेकिन अयोध्या धार्मिक एकता की मिसाल बन सकता है। बशर्ते अयोध्या के लोगों को ही मिल बैठकर इस विवाद को सुलझाने दें।

Saturday, September 18, 2010

बात बेईमानी की

पिछले दिनों किसी नें एक चुटकुला सुनाया जिसमें एक बच्चा अपने बाप से पूछता है कि पापा-पापा ये सरकार क्या होती है? बाप उससे पूछता है कि ये बताओ कि घर में कमाता कौन है? बच्चा कहता है कि आप कमाते हैं। तो बाप कहता है कि तो मैं घर की अर्थव्यवस्था हूं। फिर बाप पूछता है कि ये बताओ कि खर्च कौन करता है तो बच्चा कहता कि खर्च तो मां करती है तब बाप कहता है कि तुम्हारी मां इस घर की सरकार है। फिर बच्चा पूछता है कि घर में जो बाई काम करती है वो कौन है? तब बाप बताता है कि वो नौकरशाही या प्रशासन है। बच्चा आगे पूछता है कि तब मैं कौन हूं तो बाप उसे बताता है कि तुम इस देश की आम जनता हो। बच्चा फिर सवाल करता है कि पालने में जो छोटा भाई है वो कौन है तो बाप कहता है कि वो इस देश की भविष्य है।


रात में सभी सो जाते हैं। पालने में जो छोटा बच्चा था वो रोने लगता है उसके रोने से वो बच्चा जाग जाता है। बच्चा देखता है कि उसका छोटा भाई टट्टियों में पड़ा है और उसकी मां खर्राटे मार कर सो रही है। वह उसे जगाने की कोशीश करता है लेकिन उसकी मां नहीं उठती है। फिर वो अपने बाप को खोजता है वह घर की नौकरानी के साथ सोया पड़ा मिलता है। बच्चा उसे भी पुकारता है लेकिन कोई नहीं उठता। सुबह में बच्चा अपने बाप को कहता है कि आज मैं जान गया कि सरकार क्या होती है। बाप पूछता है कि सरकार के बारे में क्या जानते हो? बच्चा कहता कि देश का भविष्य टट्टियों में पड़ा है, नौकशाही अर्थव्यवस्था का शोषण कर रही है, आम जनता मारी-मारी फिर रही है और देश की सरकार है जो खर्राटे मार-मार कर सो रही है।

इस चुटकुले ने मुझे सोंचने पर मजबूर कर दिया। वस्तुत: इस चुटकुले के माध्यम से आज की व्यवस्था पर हंसी-हंसी पर करारा व्यंग किया गया है। इस चुटकुले में गंभीर निहितार्थ छुपे हुए हैं। यह न केवल सरकार बल्कि व्यक्ति और समाज पर गंभीर चोट करता है।

वस्तुत: हमें पहले अपने अंदर झांकने की जरूरत है। सरकार चलाने वाले नेता या नौकरशाह कोई आसमान से नहीं टपकते वह भी हमारे बीच से ही निकलते हैं। यहां सोने वाले , शोषण करने वाले और मारे-मारे फिरने वाले भी हम ही हैं और इस व्यव्स्था को सुधारने वाले भी हम ही हैं। किसी ने ठीक ही कहा था कि जनता को उसके चरित्र के अनुसार ही सरकार मिलती है। अगर हम पहले अपने आप को सुधार लें तो सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।

कुछ दिनों पहले भारत के पूर्व सतर्कता आयुक्त प्रत्युष सिन्हा ने कहा था कि एक तिहाई भारतीय बेईमान हैं। यह आंकड़ा अधिक भी हो सकता है। आखिर क्या कारण है कि जब लोग नौकरी के लिए प्रयास करते हैं तो ईमानदारी की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन नौकरी शुरू होते ही सारी की सारी ईमानदारी धरी की धरी रह जाती है। अगर किसी को सरकारी नौकरी मिल जाती है तो वह हर समय अपने को बेचने के लिए तैयार बैठा रहता है। कभी अपनी ईमानदारी को निलाम करता है तो कभी विवाह के मंडी में अपनी बोली लगवाता है। व्यवस्था को तो सभी कोसते हैं लेकिन उसे सुधारने की बात कोई नहीं करता।

पिछले दिनों एक रिश्तेदार से मेरी बात हो रही थी। उनके घर के सदस्य जो सप्लाई विभाग में हैं, की पोस्टिंग उसी शहर में हो गई। मेरे रिश्तेदार ने बताया कि अब उनके घर के राशन का खर्च बच जाता है। मैंने उनसे कहा कि इस तरह की राशन खाना सही नहीं है तो मुझे जवाब मिला कि घर के बड़े सदस्य हैं उन्हें मना नहीं कर सकते। ऐसी कई छोटी-छोटी चीजें हैं जिसे करते समय हम जरा भी नहीं सोंचते कि हम क्या गलत कर रहे हैं। हम दूसरे से तो ईमानदारी और नैतिकता की बातें करते हैं लेकिन जब भी मौका मिले उसे तोड़ने में जरा भी नहीं हिचकते। जब कुछ करोड़ रूपये का बोफोर्स घोटाला हुआ था तो कितना बवाल मचा था लेकिन आज हजारों करोड़ रूपये का घोटाला हो जाता है लेकिन सब कुछ सामान्य सा लगता है। जाहिर है कि बेईमानी को लेकर समाज में स्वीकार्यता बढ़ी है।

एनसीईआरटी के किताबों के कवर पर गांधीजी का जंतर पढ़ने को मिलता है जिसमें बेईमानी से निपटने का उपाय बताया गया है। लेकिन गांधीजी के जंतर को भले ही हम रट्टू तोते की तरह याद कर लें लेकिन इसका अर्थ न हो हम समझना चाहते हैं और न ही सरकार चाहती है कि जनता इसका मतलब समझे।

Friday, September 10, 2010

सफेदपोशों का खेल

भद्रजनों के खेल कहे जाने वाले क्रिकेट को क्या हो गया है। लगता है सफेद कपड़ों में खेले जाने वाला खेल (अब सफेद कपड़े में केवल टेस्ट मैंच ही खेला जा रहा है) सफेदपोशों का खेल बनता जा रहा है। पिछले दिनों पाकिस्तान के सात खिलाड़ियों का नाम मैच फिक्सिंग में सामने आया। यह पहला मौका नहीं है जब मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया है, लेकिन इस बार स्पॉट फिक्सिंग के रूप में एक नया मामला सामने आया है। पहले खिलाड़ी पैसे लेकर खराब खेलते थे लेकिन अब यह भी तय होने लगा कि कौन सा बॉलर पहला ओवर डालेगा और ओवर की कौन सी डिलीवरी नोबॉल होगी।

लेकिन पाकिस्तान की प्रतिक्रिया देखिए उसे तो हर गलत काम के पिछे भारत की साजिश ही नजर आती है। चाहे लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमला हो या पाकिस्तान में बाढ़ हो या फिर मैच फिक्सिंग में उनके खिलाड़ियों का फंसना। जब आईसीसी ने पाकिस्तान के तीन खिलाड़ियों को निलंबित किया गया तो उसपर भी पाकिस्तान ने कहा कि भारत पाकिस्तान में क्रिकेट को तबाह करना चाहता है। लंदन में पाकिस्तानी उच्चायोग के एक अधिकारी ने तो आईसीसी अध्यक्ष शरद पवार पर मुकदमा करने की भी धमकी दे डाली।

इससे पहले भी पाकिस्तान के कुछ खिलाड़ी मैच फिक्सिंग की फांस में फंस चुके हैं। पाकिस्तान अगर समय रहते इसके लिए कोई ठोस कदम उठाता तो शायद क्रिकेट कलंकित नहीं होता। बात यहां सिर्फ किसी खास देश के खिलाड़ियों के फंसने की नहीं है बल्कि पूरे खेल के दागदार होने की है। पाकिस्तान के हालात अच्छे नहीं हैं। पाकिस्तान जाकर कोई देश खेलना नहीं चाहता। श्रीलंका के शेरों ने कुछ हिम्मत दिखाई भी थी तो उनका स्वागत गोलियों से हुआ। इसके बाद वर्ल्ड कप का आयोजन भी पाकिस्तान से छिन गया। इस पर भी उसने भारत पर ही आरोप लगाया था।

पाकिस्तान की क्रिकेट भी राजनीति का शिकार हो गई है। किसी भी खिलाड़ी का स्थान सुरक्षित नहीं है। कप्तान दर कप्तान बदले जाते हैं। वरिष्ठ खिलाड़ी भी बड़े बेआबरू होकर बाहर टीम से बाहर निकाले जाते हैं। ऐसे में खिलाड़ियों को जब टीम में मौका मिलता है तो दौलत और शोहरत के भूखे खिलाड़ियों को फिसलने में देर नहीं लगती। ऐसे में पाकिस्तान अपने यहां के हालात सुधारने के बारे में सोंचे। हर बात में भारतीय साजिश की शुतुरमुर्गी सोंच से ऊपर उठे। तभी देश का भला होगा। अभी तो तीन क्रिकेटरों पर प्रतिबंध लगा है, ख़ुदा ना करे कि कहीं पूरी टीम पर ही प्रतिबंध न लग जाए। एक तो पाकिस्तान भ्रष्टाचार के आरोपों से परेशान रहा है। पाकिस्तान में आतंकवाद और बाढ़ की आपदा बड़ी तबाही मचा रही है। ऐसे में सरकार की उदासीनता और आपदा के समय राष्ट्रपति के यूरोप भ्रमण के कारण देश की छवि पहले से ही गिरी है दूसरे अगर और अगर ऐसा हुआ तो उस देश की कितनी बदनामी होगी और इस दाग को धोना बड़ा मुश्किल होगा।

दूसरे देशों के खिलाड़ियों का नाम जब मैच फिक्सिंग में आया तो उन पर वहां के बोर्डों ने कार्यवाही की लेकिन पाकिस्तान को तो पहले सबूत चाहिए और पाकिस्तान की तो यह नियती हो गई है कि कितने भी सबूत दे दो उससे उसका पेट नहीं भरता। पिछले वर्ड कप में ही तो आयरलैंड के खिलाफ मैच में पाकिस्तान की शर्मनाक हार के बाद बवाल मचा था कहा गया कि मैच फिक्स थी। मैच के बाद टीम के कोच बॉब वूल्मर संदिग्ध परिस्थितियों में अपने होटल के कमरे में मृत पाए गए उस घटना की न तो गुत्थी सुलझी और न तो पाकिस्तान ने उससे कोई सबक लिया। शायद पाकिस्तान की सोंच ही हो गई है कि बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ।

Saturday, September 4, 2010

पैसा है प्यारा-प्यारा, काम-काज नहीं गंवारा

कुछ दिनों पहले सांसदों के वेतन बढ़ाने को लेकर बड़ा हंगामा मचा। कुछ सांसदों ने कहा कि इस समय सांसदों के वेतन बढ़ाने से महंगाई की मारी जनता के बीच गलत संदेश जाएगा। वहीं लालू-मुलायम जैसे सांसदों ने वेतन बढ़वाने के लिए मोर्चा खोल दिया और यहां तक कह दिया कि सांसदों के वेतन बढ़ाने को लेकर वही लोग विरोध कर रहे हैं जिनके विदेशी बैंकों में पैसे जमा हैं और अंतत: उनका वेतन बढ़ ही गया। वैसे अधिकांश सांसद वेतन बढ़ाने के पक्ष में ही थे।

वेतन बढ़वाने की मांग के पीछे उनका तर्क था कि सचिवों की तनख्वाह उनसे अधिक है इसलिए उनसे पद में ऊपर होने के कारण उनका वेतन सचिवों से एक रू. ही सही अधिक तो होना ही चाहिए। हालांकि सांसदों के वेतन बढ़ाने के मुद्दे पर हर जगह इस बात की आलोचना हुई और लोगों में उनके प्रति गलत संदेश ही गया।

सांसदों का वेतन क्यों नहीं बढ़ना चाहिए और इसका विरोध इतना अधिक क्यों है? सांसदों के वेतन बढ़ाने के पक्ष में जो बातें हैं वो यह कि सांसदों को दो जगह घर रखना पड़ता है। हालांकि उन्हें दिल्ली में बंगला मिलता है। सरकारी कर्मचारियों की तुलना में उनका ऑफिस 24*7 खुला रहता है। क्षेत्र की जनता का इनके यहां आना-जाना बदस्तुर जारी रहता है। इनके स्वागत सत्कार पर भी खर्च होते हैं। इसके अतिरिक्त भी बहुत सारे खर्च हैं जो पहले के वेतन से बमुश्किल से पूरा हो पाता है। अन्य देशों की तुलना में भी यहां के सांसदों का वेतन बहुत कम है। इसलिए वेतन बढ़ना जायज है।
बाबूओं से अगर तुलना करें तो दोनों ही तो भ्रष्ट हैं। बाबू भी तो वेतन के अलावा अन्य तरीकों से कमाई करते हैं। उनके भी तो कई बेनामी संपत्तियां हैं। बिना कमीशन लिए तो वो भी काम नहीं करते। फिर उनका वेतन इतना अधिक क्यों? बाबू की तुलना में नेताओं से लोग ज्यादा नाराज क्यों हैं?

बाबूओं की तुलना में सांसदों के खिलाफ लोग शायद इसलिए हैं क्योंकि बाबू बनने के लिए कुछ योग्यता की दरकार होती है लेकिन नेता बनने के लिए केवल धनबल,बाहुबल और चाटुकारिता आदि गुणों की ही आवश्यता होती है। बाबू तो जनता से कमीशन लेते है लेकिन नेता तो इन बाबूओं से भी कमीशन ले लेते हैं और इन्हें भ्रष्ट बनाने वाले शायद नेता ही हैं। बाबू तो कुछ काम भी करते हैं लेकिन नेताओं के लिए काम करने का कोई बंधन नहीं होता है न ही उनपर किसी तरह की जिम्मेदारी होती है। संसद में चाहे हंगामे में कितना ही वक्त जाया कर लो और संसद की कार्यवाही में चाहे जितना ही पैसा जाया होता हो तो होने दो। हमारा क्या है हमें तो उसमें हिस्सा लेने पर उसका भुगतान तो मिल ही जाएगा। एक और बात यह है कि बाबू तो अपने हाथों अपना वेतन नहीं बढ़ा पाते हैं वहीं सांसद अपना वेतन अपनी मनमर्जी बढ़ाते रहते हैं।

सांसदों को वेतन के अलावा ढेरों सुविधाएं हैं जो उन्हें मुफ्त में मिलती हैं। जैसे बिजली, पानी, फोन आदि की असीमित छूट। मुफ्त में इन सुविधाओं को मिलने के कारण सांसदों के लिए इनका कोई मोल नहीं होता। एक तरफ सरकार लोगों को बिजली और पानी की बर्बादी रोकने और उन्हें बचाने की नसीहत सिर्फ जनता के लिए ही होती है सांसदों और विधायकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। आम जनता के लिए सरकार इन मूलभूत सुविधाओं की कीमत बढ़ाती जा रही है और नेता इसे बेकार में बहाए जा रहे हैं। एक तरफ बिजली बचाने के लिए सरकार अर्थ ऑवर मनाने का रस्म अदायगी करती है वहीं नेताओं के बंगले रोशनी में नहाए रहते हैं। यहां अगर नेता लोग खुद पहल करके इन्हें बचाने का प्रयास करें तो जनता भी इसका अनुकरण करेगी और देश के लिए यह एक भला काम होगा।

बेशक सांसदों के वेतन बढ़ा दिए जाएं लेकिन इनकों मिलने वाली मुफ्त की सुविधाओं को बंद कर दिए जाएं जिससे इनके मोल का इन्हे पता चले। साथ ही इनके कामकाज के लिए कुछ उत्तरदायित्व भी तय हों। वेतन बढ़ाने के लिए एक आयोग बने। सांसदों को मिलने वाली सांसद निधि से होने वाले खर्च पर भी कड़ी निगरानी रखी जाए और संसद की कार्यवाही अगर सांसदों के हंगामे के भेंट चढ़ जाती है तो उस दिन का वेतन उनसे काट लिया जाए। साथ ही सांसदों को संसद की कार्यवाही में न्यूनतम उपस्थिति की एक सीमा भी तय कर देना चाहिए। मेरे ख्याल से वेतन बढ़ने से जनता को ज्यादा आपत्ति नहीं होगी अगर सांसद अपना आचरण सुधारें, हंगामें की जगह स्वस्थ बहस करें और जनता की परेशानियों के बारे में भी सोंचें। सांसदों के पास एक अच्छा मौका था कि वह महंगाई की मारी आम जनता के सामने एक मिसाल पेश करती जिसे उन्होंने गंवा दिया।