Sunday, August 29, 2010

पानी, पानी रे पानी, पानी

पिछले दिनों जब दिल्ली बरसात में पानी-पानी हो रही ठीक उसी समय बिहार में लोग पानी-पानी चिल्ला रहे थे। दो साल पहले की ओर लौटें तो इसी समय बिहार बाढ़ से बेहाल था। पिछले साल भी मानसून दगा दे गया था। पिछले कुछ सालों में अगर देखें तो मानसून का रूठना जारी है, कभी तो बहुत ही ज्यादा बारिश और कभी कुछ भी नहीं। जिस इलाके में सूखा रहता था वहां बाढ़ आ जाती है और जहां बाढ़ की समस्या रहती थी वहां सूखा पड़ने लगा है।
कुछ साल पहले मुंबई में इतनी बारिश हुई कि चेरापूंजी का रिकार्ड टूट गया। कुछ साल पहले राजस्थान को भी बाढ़ की तबाही से दो-चार होना पड़ा था। दिल्ली में वर्षों बाद इतनी बारिश हुई है। वहीं बिहार में सूखा पड़ा है। अगर गौर करें तो लगता है कि मानसून का दिशा ही बदल गई है। अब इसका कारण अल निनो हो या ला निनो या फिर ग्लोबल वार्मिंग समय रहते अगर इस समस्या का हल नहीं ढूंढ़ा गया तो पानी के लिए लोग खून बहाएंगे।
दिल्ली जैसे शहरों में भले ही कितनी भी बारिश हुई हो लेकिन इससे भूजल का स्तर नहीं बढ़ा है। गाजियाबाद में एक तरफ लोग आसमान से बरसने वाली पानी से परेशान थे तो दूसरी ओर पीने के पानी के लिए भी तरस रहे थे। बाढ़ और सूखा जैसे आपदा प्रकृति के साथ-साथ मानव निर्मित भी होते जा रहे हैं। अत्यधिक शहरीकरण के कारण पुरानी जल प्रणालियां जैसे झील, तालाब आदि नष्ट होती जा रही हैं। मुंबई के जलमग्न होने की एक वजह मीठी नदी के जल मार्ग के साथ छेड़-छाड़ थी। नदियों या नहरों में गाद जमा होती रहती है लेकिन उसकी सफाई नहीं हो पाती है। आखिर ऐसे में बारिश का पानी कहां जाए। वह तो तबाही मचाएगी ही। पोखरों या झीलों को पाटकर हमने उस पर ऊंचे-ऊंचे महल-दोमहले खड़ा कर दिए हैं। इससे बरसात के पानी का सही सदुपयोग नहीं हो पाता है।
अब वक्त आ गया है कि हम पानी का प्रबंधन करना सीखें। बाढ़ से बचने के लिए पहले तो नदी-नाले और नहरों की सफाई तो करवाई ही जाए दूसरी ओर बरसात के पानी के सदुपयोग के लिए पोखरों और झीलों की भी समय-समय पर सफाई हो साथ ही रेन वाटर हारवेस्टिंग और भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए वाटर रिफिलिंग जैसे उपाय करने होंगे। इसके लिए बहुत अधिक तामझाम करने की भी जरूरत नहीं है बस छतो से नीचे गिरने वाले पानी को पाइप के जरिए कुओं, हैंडपंपों या सॉकपीट के जरिए जमीन के अंदर पहुंचाना है। मुसीबत के समय सरकार की ओर मदद की आस लगाने के बजाय अगर हम खुद ये सब उपाय अपनाएं तो पीने के पानी की समस्या नहीं होगी। सरकार को भी चाहिए कि वह कुछ ठोस पहल करे। नदियों को जोड़ने की जो परियोजना चल रही है उसे समय से पूरा करे साथ ही ऐसे उपाय किए जाएं कि बाढ़ वाले इसाके के पानी का इस्तेमाल सूखा ग्रस्त इलाकों में किया जा सके। आपदा के समय करोड़ों के राहत पैकेज देने से अच्छा है कि आपदा आए ही नहीं इसके लिए समय रहते उपाए किए जाएं।

Sunday, August 22, 2010

सेवा नहीं सिर्फ मेवा की चिंता

पहले अपने देश में दो क्षेत्र ऐसे थे जिसमें सेवा भाव अधिक था। लेकिन बदलते जमाने के साथ इन दोनों क्षेत्रों को भी प्रोफेशनलिज्म और मैनेजमेंट ने अपने जबड़े में लिया है। मैं बात कर रहा हूं शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र की। अब यहां सेवा कम और मेवा पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

पिछले दिनों मुझे इन दोनों सेवाओं में बढ़ते व्यापार से सामना हुआ। पहले शिक्षा को लेते हैं। पिछले दिनों मेरे एक रिश्तेदार अपने बेटे के एडमिशन के लिए दिल्ली आए। मुझे भी उनके साथ स्कूल जाना पड़ा। स्कूल 'तथाकथित' इंटरनेशनल था। स्कूल दिल्ली के बाहरी इलाके में एक गांव में कई एकड़ में फैला था। स्कूल में अस्तबल, खेल के मैदान, स्विमिंग पुल आदि मौजूद थे। स्कूल का फीस तो लाख दो लाख था पर उनके बेटे ने दसवीं में A+ ग्रेड पाया था इसलिए उसे पूरा स्कॉलरशिप मिल गया था। ऐसा स्कूल इसलिए करते हैं कि अच्छे स्टूडेंट को लेने से उनका रिजल्ट अच्छा हो सके।

स्कूल में मैंने देखा कि इंजीनियरिंग और मेडिकल के कोचिंग सेंटर अपना स्टॉल लगा कर बैठे थे। कैंपस में भी कोचिंग की व्यवस्था थी और अगर कोई छात्र कोचिंग के लिए बाहर जाना चाहे तो उसे स्कूल बस से कोचिंग सेंटर लाने और ले जाने की व्यवस्था थी। उस कोचिंग वाले ने हमें समझाया कि आपका लड़का सुबह से दोपहर तक स्कूल में क्लास करेगा उसके बाद दोपहर से शाम तक बाहर कोचिंग करेगा और शाम में थका आएगा तो सेल्फ स्टडी कब कर पाएगा। उसने बताया कि अगर अपने बच्चे को कैंपस में ही कोचिंग में डलवा देते हैं तो स्कूल का क्लास नहीं करना पड़ेगा और ना ही कोचिंग के लिए बाहर जाना पड़ेगा। इस तरह सेल्फ स्टडी के लिए वक्त भी मिल जाएगा। इसके लिए स्कॉलरशिप की भी व्यवस्था थी लेकिन स्कॉलरशिप मिलने के बाद भी कोचिंग की फीस 75 हजार थी। मेरे मन में सवाल उठा कि जब कोचिंग में ही पढ़ाना है तो फिर बच्चे को लोग इतनी दूर क्यों लाते हैं और स्कूल की क्या भूमिका रह जाती है।

बहरहाल उस समय मेरे रिश्तेदार ने कोचिंग में बच्चे को नहीं डलवाया। लेकिन कुछ समय बाद उन्हे महसूस हो गया कि स्कूल में पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं है और बच्चे को कोचिंग में डलवाना ही पड़ेगा। आजकल जगह-जगह कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कोचिंग सेंटर तो लोगों को तो सपने बेच ही रहे हैं। लेकिन क्या स्कूल सपनों को बेचने में सहयोग कर बहती गंगा में हाथ नहीं धो रहे हैं।

पहले जहां गुरूकुल प्रणाली थी। छात्र अगर गरीब होता था तो गुरू की सेवा कर शिक्षा प्राप्त कर सकता था। गुरू का भी जोर छात्रों को अच्छी शिक्षा देने में होती थी। लेकिन आजकल तो व्यवस्था एकदम उलट ही गई है।
अब चिकित्सा सेवा को लेते हैं। पिछले महिने घर के एक सदस्य को कुछ तकलीफ थी। इलाज के लिए निजी अस्पताल गईं। चूंकि उनके पास मेडीक्लेम था इसलिए अस्पताल नें उन्हें भर्ती करने में जरा भी देर नहीं की। पानी का बोतल लगा दिया गया और तरह-तरह के टेस्ट करवाया जाने लगा। कोई बिमारी नहीं होने पर भी तीन दिनों तक अस्पताल में ही रूकने का इंतजाम कर दिया गया।

दूसरा केस मेरे पिताजी का है जो डायबिटिज के मरीज हैं। उन्हें एक सरकारी अस्पताल में ही लेकर गया। उन्हें डॉक्टर ने सात तरह की दवाईयां लिखी हैं जो आजीवन चलेगा और दवाईयों का खर्च दो हजार महिना है। मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि डायबिटिज या ब्लडप्रेशर जैसे रोग जो एक बार होने के बाद मरने तक चलते हैं,के लिए सस्ती दवाईयां नहीं बननी चाहिए। अगर यह रोग गरीब या निम्न मध्यम वर्ग के लोग को हो तो वह इसना खर्चा कैसे उठाएगा। उसे तो रोग को नजरअंदाज करना पड़ेगा। बचपन में अगर पेट में कोई गड़बड़ी होती थी तो दस पैसे के दवा से ठीक हो जाता था लेकिन आजकल को इसके लिए भी दस रूपये का दवा लेना पड़ता है। कंपनियों का तो मुनाफा ही कर्तव्य है लेकिन डॉक्टर सेवा के अपने कर्तव्य को क्यों भूल जाते हैं।

Sunday, August 15, 2010

आओ खेलें दुल्हा दुल्हन

कहते हैं कि शादी-ब्याह कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं होता है। लेकिन आज कल तो यह खेल-तमाशा ही बनता जा रहा है। कुछ लोगों ने इसे खेल बना दिया है। इनके लिए शादी और खेल में ज्यादा अंतर नहीं है। खेल की तरह ही इसमें पैसा है, मनोरंजन है और ग्लैमर भी है। इसमें भी मीडिया कवरेज है और खेलों की तरह मैच फिक्सिंग का खतरा भी।

करीब साल भर पहले एक शो आया था राखी का स्वयंवर लेकिन शो के अंत में पता चला कि शादी तो होगी ही नहीं। फिर एक दूसरा शो आया राहुल दुल्हनियां ले जाएगा। इसके प्रचार में कहा गया कि सिर्फ स्वयंवर ही नहीं शादी भी। और शादी हो भी गई। लेकिन कुछ महिने बाद ही खेल में एक नया मोड़ आ गया। राहुल की दुल्हनियां डिम्पी में राहुल पर पिटाई का आरोप लगाया। यह आरोप राहुल के लिए नया नहीं है, राहुल की पहली पत्नी ने भी ऐसा ही आरोप लगाया था और बाद में उसने राहुल को तलाक दे दिया था।

मीडिया को जैसे ही इसकी भनक लगी इस खबर के मैराथन प्रसरण में लग गई। कई विशेषज्ञ बैठ गए और कई एंगल से इस खबर का विश्लेषण होने लगा। आखिर मीडिया इतने अच्छे कैच (खबर) को कैसे छोड़ सकती थी। इसमें मशाला और मनोरंजन तो था ही साथ ही इस कैच को ड्रॉप करने का मतलब था टीआरपी रूपी कप से हाथ धो बैठना।

पहले तो राहुल पर तमाम तरह के आरोप लगे। फिर कुछ लोगों ने डिंपी पर भी आरोप लगाया कि डिंपी कोई दूध की धुली नहीं है। आखिर राहुल का चरित्र तो किसी से छुपा नहीं था। फिर ऐसे में डिंपी ने रिस्क क्यों लिया। क्या इसके पिछे पैसा और शोहरत की भूख थी। हो सकता है कि इस खेल के पीछे भी कोई खेल हो। इसका खुलासा हो सकता है बाद में हो। लेकिन जिस दिन भी यह हुआ मीडिया को फिर एक मशाला मिलेगा। राष्ट्रहित के मुद्दे फिर गौण हो जाएंगे, और दर्शक एक बार फिर ठगे जाएंगे। क्योंकि वर्तमान दौर में ठगे जाना ही दर्शकों की नियती हो गई है।

एक बार डीयू में प्रभाष जोशी जी ने पत्रकारिता के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था कि आज स्वयंवर दिखा रहे हो कल तुम्हें प्रसव दिखाना होगा। प्रभाष जी टीवी पर आ रहे ऐसे प्रोग्रामों से काफी खिन्न थे। अगर चैनलों का बस चले तो शादी क्या सुहागरात और प्रसव सब कुछ दिखा देंगे। क्योंकि उनका सिद्धांत ही हो गया है कि सब कुछ खेल है और इस खेल में सब कुछ बिकता है।

Sunday, July 18, 2010

मीडिया नहीं लोकतंत्र पर हमला

यह पोस्ट पब्लिश करने में थोड़ा टाइम लग गया। लेकिन मैं अपनी बात कहे बिना रह न सका। पिछले दिनों आजतक के ऑफिस पर संघ के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया। संघ के कार्यकर्ता आजतक के सहयोगी चैनल हेडलाइंस टुडे पर दिखाए गए उग्र हिंदुवाद के स्टिंग ऑपरेशन से भड़के हुए थे। इस हमले को केवल एक मीडिया संस्थान पर हमले के रूप में न लेकर लोकतंत्र पर हमले के रूप में देखा जाना चाहिए। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है। हमे संविधान ने अभिव्यक्ति की आजादी दी है। इस तरह यह हमला लोकतंत्र और संविधान पर आघात करता है और भारत के नागरिक होने के नाते हमारा यह मूल कर्तव्य है कि हम इस तरीके के किसी भी हमले का पूरजोर विरोध करें।
ऐसा पहली बार नहीं इससे पहले भी इस तरीके हमले मीडिया पर होते रहे हैं। कुछ साल पहले मुंबई में स्टार का ऑफिस उपद्रवियों का निशाना बना था। लेकिन देश की राजधानी में इस तरह की पहली घटना है। आजकल देश में विरोध के नाम पर विध्वंश की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। किसी का कहा अगर रास न आए तो उसका मुंह बंद कराने की कोशिश की जाती है।
संघ ने अपने बयान में कहा कि उनका केवल शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन का कार्यक्रम था। संघ ने इस हमले को डेमोक्रेटिक बताते हुए कहा कि जिस तरह मीडिया को अपनी बात कहने की आजादी है उसी तरह उन्हें भी विरोध करने का अधिकार है। सही है आप विरोध करिए लेकिन विरोध का यह तरीका किस देश की डेमोक्रेसी में आता है। विरोध के नाम पर तोड़फोड़ का अधिकार आपको किसने दे दिया। अगर शांति पूर्ण प्रदर्शन का ही प्रोग्राम था तो फिर यह प्रदर्शन उग्र कैसे हो गया। इसकी जिम्मेवारी तो संघ की ही बनती है और इसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए।
संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा ने भी संघ का बचाव ही किया। आजतक पर भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद का सारा जोर बहस को मुख्य मुद्दे से भटकाकर स्टिंग ऑपरेशन की आलोचना करना था। उनका कहना था कि टीआरपी के लिए मीडिया इस तरह की चीजें दिखाती हैं। और जब आजतक पर हेडलाइंस टुडे के राहुल कंवल आए तो रविशंकर प्रसाद शो छोड़कर चले गए। इसमे तो मूल सवाल यही है कि विरोध का यह तरीका कैसे सही है? स्टिंग ऑपरेशन की भावना या सच्चाई की बात तो अलग मुद्दा है और इसका बात करना तो मुद्दे से भटकना है। अगर स्टिंग गलत भी है तब भी उन्हें हमले का हक नहीं मिलता। उन्हें पहले चैनल पर आके अपनी बात रखनी चाहिए। फिर वह चैनल पर मुकदमा कर सकते थे।
संघ अपने अनुशासन के लिए जाना जाता है। वह हमेशा सिद्धांतों की बात करता है। इमरजेंसी के समय प्रेस पर सेंसर का उसने भी विरोध किया था। मैंने सुना है कि देश में कही अगर कोई आपदा आती है तो संघ के लोग पहले पहुंचते है और राहत कार्य में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। इसी तरह अपने को पार्टी विद डिफरेंश कहने वाली भाजपा के नेता रविशंकर प्रसाद को विभिन्न बहसों में भाग लेते और दूसरों की धज्जियां उड़ाते देखा है। इनके प्रति जो भी इज्जत मन में थी वह मीडिया पर हमले पर उनके स्टैंड से कम गया।
दूसरा मुझे इस बात का भी दुख है कि इस खबर को प्रिंट मीडिया ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी। जैसे यह हमला केवल इलेक्टॉनिक मीडिया पर था। दूसरे के घर पर हमला होता है तो होने दो अपना घर तो अभी सुरक्षित है। कुछ इसी तरह का रूख अखबारों ने रखा। दूसरे दिन हिंदुस्तान में यह खबर लीड थी कि भारत में ढाई करोड़ की मर्सीडिज बिकेगी। लेकिन हमले वाली खबर सिंगल कॉलम में बीच में कहीं छुपा था और पूरी खबर पांचवें पन्ने पर नीचे लगाया गया था। इस पर न तो कोई संपादकीय और न तो कोई लेख छापा गया। यही हाल हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया का था। यह बात समझ से परे है कि अगर ढाई करोड़ की कार अगर भारत में बिकती है और दस लोगों ने इसके लिए बुकिंग करवा भी ली है तो इससे कितने लोगों को फर्क पड़ता है। जिन लोगों की खबरें अखबार ने छापा है वो लोगो तो उनकी अखबार पढ़ते भी नहीं होंगे। लेकिन मीडिया पर हमला वाली खबर से भले अभी लगे न लगे लेकिन इससे पूरा देश प्रभावित होगा। मीडिया के अभियान की वजह से ही बहुत सारे घोटाले सामने आए हैं और बहुत सारे केस में दोषी मीडिया की सक्रियता के कारण ही दोषी को सजा मिल पाई है। अगर मीडिया का मुंह बंद करने की कोशिश हुई तो देश में भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। फिर बात-बात में कानून हाथ में लेने की प्रवृति भी खतरनाक है। इससे लोकतंत्र पर लाठी धारी भीड़ तंत्र का अधिकार हो जाएगा। जो बात-बात में हमें सिखाएगा कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

Monday, July 12, 2010

फुटबॉल के बहाने

फुटबॉल के महाकुंभ का समापन हो गया। यह वर्ल्ड कप
शकीरा के वाका-वाका गीत और जर्मनी के ऑक्टोपस पॉल
के लिए यादगार रहेगा। इस विश्व कप में स्पेन के रूप में एक विश्व को एक नया चैंपियन मिला।
विश्व कप शुरू होने के पहले जो खिलाड़ी हीरो थे,
वो सब जीरो साबित हुए। मेसी, काका, रोनाल्डो, रूनी जैसे फुटबॉल के सुपर स्टार का फ्लॉप हो गए। जबकि इन सबों की लोकप्रियता को पीछे छोड़ते हुए ऑक्टोपस
पॉल बाबा हीरो बन गए।
पॉल बाबा अब किसी परिचय के मोहताज नहीं रह

गए हैं। अखबारों से लेकर टीवी चैनल सभी उन्हीं के
रंग में रंगे हैं। उनकी भविष्यवाणियां सौ फीसदी
सही साबित हुई हैं। एक तरफ उनके
लाखों दीवाने हैं तो दूसरी ओर जर्मनी
वाले उनके खून के प्यासे बन गए हैं।
सच्चाई आखिर जो भी हो इतना तो तय
हो ही गया कि जो पश्चिमी देश हमें सपेरों
का देश कहकर हमारी खिल्ली उड़ाते थे वो
भी हमसे कम नहीं हैं।
खेल के आयोजन के समय इस बात का दुख
हमें सालता रहा कि हमारा देश इस महाकुंभ
में डुबकी क्यों नहीं लगा पाया। हर बड़े खेल के आयोजन में जब हमारा देश पिछड़ जाता है तो हम थोड़ी देर दुख प्रकट करते हैं। हम कहते हैं कि हमारे देश की एक अरब आबादी में से इतने खिलाड़ी भी नहीं निकल पाए कि देश को क्वालिफाई करवा सकें या ओलंपिक में मेडल दिलवा सकें। फिर हम इसके लिए क्रिकेट को कोस लेते हैं। जैसे क्रिकेट ही इस समस्या का जड़ हो और क्रिकेट इन खेलों का शत्रु हो। इसके बाद हम चार साल तक चुप बैठ जाते हैं।
किसी भी खेल में पिछड़ने का कारण किसी दूसरे खेल को बताना सही नहीं है। ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड की आबादी हमारे देश से काफी कम है। ये दोनो देश क्रिकेट के पुराने खिलाड़ी हैं। यहां भी क्रिकेट की लोकप्रियता किसी से कम नहीं है। बावजूद इसके कि दोनो देश फीफा वर्ल्ड कप में भी भाग लेते हैं। किसी भी खेल में किसी को इंट्रेस्ट नहीं है तो उसे आप जबरदस्ती नहीं उस खेल को देखने को कह सकते हैं। ठीक उसी तरह जैसे जर्मनी, इटली या फ्रांस वाले को क्रिकेट के बारे में शायद ही कुछ पता हो और आप उन्हें क्रिकेट देखने को नहीं कह सकते। भारत में प. बंगाल, गोवा और केरल में फुटबॉल लोकप्रिय है और इनकी आबादी भी फुटबॉल खेलने वाले कई देशों से अधिक होगी फिर क्यों नहीं ये राज्य मिलकर एक ऐसी टीम खड़ी कर पाते हैं जो वर्ल्ड कप में क्वालिफाई कर सके। अब तो इसके लिए विदेशी प्रशिक्षक भी रखे जा रहे हैं। भारत में फुटबॉल तभी ज्यादा लोकप्रिय हो सकेगा जब हम बड़े इवेंट में भाग ले सकें।
अगर ओलंपिक की बात करें तो हमें हॉकी से ज्यादा उम्मीदें रहती हैं। लेकिन इन उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। अगर हम टीम इवेंट की जगह व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा पर ज्यादा ध्यान दें तो हमें ज्यादा मेडल मिल सकता है क्योंकि टीम इवेंट में एक मेडल के पीछे ग्यारह खिलाड़ी होते हैं जबकि अन्य इवेंट जैसे टेनिस, बैडमिंटन, तीरंदाजी, दौड़ आदि में एक या दो खिलाड़ी मिलकर कई मेडल जीत सकते हैं। जैसे माईकल फेल्प्स को ही लें वह आठ-आठ स्वर्ण अकेले जीत लेते हैं। हमारा पड़ोसी देश चीन भी फुटबॉल में कुछ खास नहीं कर सका है लेकिन ओलंपिक में उसका दबदबा रहता है। इसका कारण है कि वहां सिंगल इवेंट पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। हमें भी भीड़ के पीछे नहीं भागना चाहिए। जहां जिस खेल में लोगों की रूचि हो वहां उसे ही बढ़ावा देना चाहिए। अगर हर राज्य अपने यहां एक-एक खेलों को ही बढ़ावा देने में लग जाएं तो हम कई मेडल जीत सकते हैं। जैसे हरियाणा में बॉक्सिंग का क्रेज बढ़ता जा रहा है और इसे वहां बढ़ावा भी दिया जा रहा है। इसी तरह अन्य राज्यों को भी यह मॉडल अपनाना चाहिए।
हमारी यह मानसिकता है कि हम ऐसा सोंचते हैं कि देश में जो भी क्रांतिकारी हो, खिलाड़ी हो या समाज सुधारक हो वह हमारे पड़ोस में हो। हमारे बच्चे तो डॉक्टर, इंजीनियर बनें। हम कोई भी अच्छी पहल खुद से नहीं करना चाहते हैं। अब ऐसे में हम कैसे मेडल जीतने की सोंच सकते हैं।

Sunday, July 11, 2010

राजनीति में यह कैसी नीति


रामविलास पासवान नें राज्यसभा में पहुंचने के साथ ही ऐलान कर दिया कि वह केंद्र में मंत्री नहीं बनेंगे। ऐसा लगा कि जैसे उन्हें कोई मंत्री पद का ऑफर मिल रहा था और वह कोई बड़ा त्याग कर रहे हैं। रामविलास जी के पार्टी का लोकसभा में कोई सदस्य नहीं है। राजद के कुछ सदस्य हैं भी तो कांग्रेस नें उन्हें कोई भाव नहीं दिया तो रामविलास जी को क्यों भाव देने लगे। उन्होंने लगे हाथ यह घोषणा भी कर डाली कि 10 तारीख को महंगाई के खिलाफ बिहार बंद रहेगा।
अब यह बात समझ से परे है कि जब पिछले ही दिनों विपक्षी पार्टियों ने मिलकर भारत बंद करवाया था तब उस समय लालू और पासवान जी ने उस बंद का समर्थन क्यों नहीं किया था? जब मुद्दा एक ही था तो क्या एक दिन भी ये लोग क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर साथ काम नहीं कर सकते? और फिर महंगाई के खिलाफ सिर्फ बिहार बंद ही क्यों?
कुछ महिने पहले ही जब विपक्ष ने महंगाई के खिलाफ कटौती प्रस्ताव लाया था तब भी लालू जी ने इसका समर्थन नहीं किया था और बाद में इसके खिलाफ सड़क पर धरना-प्रदर्शन करके लोगों को परेशान किया था। कल भी इन लोगों ने लोगों को परेशान करने के अलावा कुछ नहीं किया।
कल मैं टेलीफोन से एक सर्वे कर रहा था। मेरी बात छपरा के महबूब हुसैन से हो रही थी, जो पेशे से दर्जी हैं और किसी तरह महिने में तीन हजार रूपये कमा पाते हैं। मैंने उनसे कुछ सवाल पूछे जैसे कि पिछले एक साल में आपका जीवन स्तर सुधरा है या नहीं? आगे एक साल में आपको अपने जीवन स्तर में सुघार की कोई उम्मीद है या नहीं? इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? आदि। उनका जवाब था कि देश में महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ती जा रही है उससे तीन हजार रूपये में घर चलाना मुश्किल हो गया है। जीवन स्तर पहले से खराब ही हुआ है और यही हालात रहे तो आगे और बदतर ही होगी। महबूब हुसैन इस बात से भी खफा थे कि कल बिहार बंद था और वह बिना कोई काम के खाली बैठे थे। जो भी थोड़ा बहुत वह रोज कमा कर रात की रोटी का इंतजाम करते थे वो शायद कल नहीं हो पाता।
मैंने सर्वे के दौरान जितने भी लोगों से बात की उनमें अधिकांश को महंगाई ही देश की सबसे बड़ी समस्या लगी। लोग महंगाई से परेशान दिखे। लेकिन बिहार के लोगों को बंद से भी परेशानी रही और हो भी क्यों नहीं? एक ही मुद्दे पर अलग-अलग दल अलग-अलग दिन बंद का आयोजन करेंगे तो परेशानी तो होगी ही। इसके अलावा बंद अगर शांतिपूर्ण और स्वेक्षा से हो तो कोई बात नहीं लेकिन आजकल बंदी में अगर कहीं आग न लगाया जाए या तोड़फोड़ नहीं किया जाए तो फिर यह बंद कैसा?
अगर साल में दो-चार बार किसी गंभीर समस्या को लेकर जिस समस्या में जनता पिस कर रह गई है तो बंद होना जरूरी है। यह सरकार को आगाह करने और विरोध करने का माध्यम है। लेकिन इसपर सभी दलों में सहमति होनी चाहिए और जनता का हित सर्वोपरि होना चाहिए। लालू-पासवान जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं उसमें उनकी हित ही ज्यादा नजर आता है और इस तरीके की राजनीति से उनका कोई भला नहीं होने वाला उलटे उनका नुकसान ही होगा। क्योंकि जनता सब देख रही है और जनता की नजर में ये लोग एक्सपोज ही हो रहे हैं।
अब राजनीति में एक दूसरे चलन की बात कर लेते हैं। पिछले दिनों पूर्व सांसद और मंत्री तस्लीमुद्दीन जेडीयू में शामिल हो गए। तस्लीमुद्दीन की छवि विवादास्पद रही है। विवादों के चलते उन्हें एकबार अपने मंत्री पद से भी हाथ धोना पड़ा था। उस समय जेडीयू ने उनका तगड़ा विरोध किया था। उस समय तस्मीमुद्दीन साहब बिहार के 'जंगलराज' के सिपाही थे और अब वह नीतीश कुमार के मुस्लिम वोट बैंक की सुरक्षा करने उनके सुशासन में शामिल हो गए हैं । नीतीश जी को इन दिनों भाजपा के साथ और नरेंद्र मोदी के बिहार चुनाव में संभावित प्रचार से अपने इस वोट बैंक की ज्यादा फिक्र हो रही है। इसके पहले भी राजद के कुछ लोग जेडीयू में शामिल हो चुके हैं। फिर इससे राजद और जेडीयू में क्या फर्क रह जाता है? जेडीयू तो कोई गंगा नहीं है जिसमें नहा कर लोग पवित्र हो जाएंगे और उनके सारे पाप धुल जाएंगे। राजनीति में बस सिर्फ यही नीति बच गई है कि जिससे अपना उल्लू सीघा हो वही नीति सच बाकी सब झूठ।

Tuesday, July 6, 2010

बंद पर बहस

महंगाई को लेकर विपक्ष का भारत बंद सफल रहा। इसपर अब बहस गरमाने लगी है कि भारत बंद करना सही था या नहीं? हिन्दुस्तान ने इसी खबर को अपनी आज की लीड बनाते हुए शीर्षक दिया है क्या मिला। पत्र ने बंद से होने वाले नुक्सान का आंकड़ा दिया है। पत्र ने अपने 'दो टूक' में लिखा है कि बंद सफल रहा। लेकिन यह बंद किसके खिलाफ था? जाहिर है केंद्र सरकार। लेकिन इसका खामियाजा किसको भुगतना पड़ा? आम आदमी को। बड़ी अजीब बात है कि मुद्दा आम आदमी का और निशाने पर भी वही। क्या विरोध का कोई रास्ता नहीं रह गया है? आगे पत्र विरोध का तरीका बताता है कि आपका कोई नेता अनशन पर बैठ जाता। अधिक से अधिक क्या होता? भूख से मर जाता। लेकिन तब ऐसा तूफान उठ खड़ा होता जिससे सरकार को अपनी नीति बदलनी पड़ती।

हिंदुस्तान कांग्रेसी विचारधारा वाला अखबार है, इसलिए उससे सरकार के मुखर विरोध की आशा नहीं कर सकते हैं। लेकिन गंभीर मुद्दे पर इस प्रकार की निर्लज भाषा की भी उम्मीद नहीं कर सकते हैं। किसी भी मामले में किसी भी व्यक्ति को जान देने के लिए कैसे कह सकते हैं? नेता भी तो हमारे ही समाज का हिस्सा हैं। क्या उनकी जान सस्ती है?
यह बात यही है कि बंद से आम जनजीवन प्रभावित होता है। हजारों करोड़ का नुकसान होता है। बंद के दौरान इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि आवश्यक सेवाओं पर कोई बाधा नहीं पड़े। साथ ही बसों, ट्रेनों और सार्वजनिक या किसी की निजी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। बंद स्वेच्छा से हो न कि जबरन। बात-बात पर बंद भी सही नहीं है।
लेकिन जिस तरह से महंगाई बढ़ती जा रही है और सरकार हाथ पर हाथ धरे तमाशा देख रही है। सरकार की ओर से जनता को महज आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला है। सरकार के मंत्री को आम जनता के हितों से ज्यादा क्रिकेट का हित प्यारा है। ऐसी हालात में विरोध का यह स्वरूप जायज था। सरकार अभी तक इसलिए निश्चिंत बैठी है कि विरोध का कोई हल्का सा भी स्वर उसके बहरे कानों तक नहीं पहुंच पा रही है। सरकार को लगता है कि मनमानी करते जाओ विपक्ष तो बंटा हुआ है ऐसे में सरकार को कौन हिला सकता है। ऐसे समय में इस गंभीर मसले पर विपक्ष की एकजुटता का प्रदर्शन जरूरी था और अगर यह नहीं होता तो यही लोग विपक्ष को ही कोस रहे होते कि जनता महंगाई से मर रही है और विपक्ष सोया हुआ है।
यह कहना कि आम आदमी के हितों के लिए आम आदमी को परेशान किया गया सही नहीं है। आखिर इतने बड़े मसले पर कुछ तो त्याग करना ही होगा। दिहाड़ी पर कमाने वाला मजदूर एक दिन थोड़ा कम कमाया यह तो दिखता है लेकिन वही मजदूर जब दिहाड़ी कमा कर घर लौटता है और महंगाई की वजह से उतने रकम में घर की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता है, तब इस पर कोई चर्चा नहीं होती है। आंकड़ों में तो दिखा दिया गया कि इतने हजार करोड़ का नुकसान हो गया। इन आंकड़ों में कितनी हकीकत होती है और इस बात पर क्यों नहीं बहस होती है कि सरकारी लापरवाही से बंदरगाहों या गोदामों में अनाज सड़ते रहते हैं और बाजार में इनकी कमी से वस्तुओं की कीमतें आसमान छूती हैं। इससे होने वाले नुकसान के बारे में क्या कहेंगे?
जहां तक बंद से कुछ मिलने ना मिलने का सवाल है, यह जरूरी नहीं है कि किसी भी चीज का परिणाम एक ही दिन में हासिल हो जाए और न ही किसी काम को यह सोंचकर नहीं रोक सकते हैं कि इसमें हम असफल हो जाएंगे। आज विरोध का एक स्वर उभरा है। कल को हो सकता है पूरी जनता ही सड़क पर आ जाए। ऐसे हालात में सरकार को सोंचने पर मजबूर होना पड़ेगा।